अनंत गोयनका की स्‍मृत‍ियों के सुनील जैन… मेरा दोस्‍त, मेरे संपादक

सुनील के विचार अप्रत्याशित तो थे पर वे आर्थिक उदारवाद की निरंतर आवाज थे। आज जब एयर इंडिया के (प्रॉक्सी) बहाने भारत सरकार पर 1.2 अरब डालर भुगताने के लिए दबाव डाला जा रहा है, मैं कल्पना कर सकता हूं सुनील एक लेख लिख रहा है…मैंने पहले ही बता दिया था न…।

Sunil Jain, FE, Anant Goenka

जिस दिन उनको माइक्रोसॉफ्ट की अत्याधुनिक सर्फेस बुक प्राप्त हुई, उनकी आंखों में बाल-सुलभ मुस्कान चमक उठी थी। वे कुछ दिन से अपने पुराने लैपटॉप से खुश नहीं थे। सर्फेस बुक उनके 2016 मॉडल के लैपटॉप के समक्ष खासी आगे की चीज़ थी। भारत में यह कुछ ही लोगों के पास थी। इसके स्क्रीन को अलग कर टेबलेट की तरह इस्तेमाल किया जा सकता था। उन्हें इस पर नोट्स लिखने में मज़ा आता था। इसके साथ एक स्टायलस भी था।

लेकिन, सर्फेस बुक ने कुछ ही दिन में दिक्कत देनी शुरू कर दी। दफ्तर का कोई भी इंजीनियर खामी नहीं पकड़ पा रहा था। और, सम्मानित सम्पादक जी की मुस्कान थोड़ी विद्रूप हो गई। फिर उनकी भौंहें तन गईं। हममें से जिनको उनके साथ काम करने का सौभाग्य प्राप्त है, वे उनके इस रूप से भली-भांति वाकिफ हैं।

एक हफ्ते की नाकाम कोशिशों के बाद सुनील और उनके गुस्से ने माइक्रोसॉफ्ट से शिकायत करने का फैसला कर लिया। उन्होंने अपना पुराना, झटकों में काम करने वाला लैपटॉप खोला और ईमेल कियाः डियर मिस्टर नाडेला, आपकी सर्फेस बुक काम नहीं कर रही….। आगे उन्होंने जो भी दिक्कतें थीं, एक-एक कर सब गिना दीं।

नाडेला ने यह मेल फौरन माइक्रोसॉफ्ट की भारतीय इकाई के मुखिया को फारवर्ड कर दिया, जिन्होंने सुनील से तत्काल संपर्क किया और बदले में ब्रांड न्यू सर्फेस बुक ऑफर कर दी। दूसरा कोई कस्टमर होता तो खुशी से उछल पड़ता। मगर, यह कस्टमर तो सुनील थे! उन्होंने जवाब दिया। “ऑफर के लिए शुक्रिया लेकिन मैं अब भी जानना चाहता हूं कि यह वाला खराब क्यों हुआ और इसे ठीक क्यों नहीं किया जा सकता।” खरीदने में मेहनत की कमाई लगी थी और सुनील जवाब चाहते थे।

लेकिन, अपने इस अंदाज़ के विपरीत जब कोविड के इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती होने की बात आई तो उन्होंने साफ मना कर दिया। मैंने उनसे पूछा कि वे अस्पताल में भर्ती होने के खिलाफ क्यों हैं? दिल्ली प्रदूषित शहर है। फिर आप तो दमे के पुराने मरीज़ हैं। उनका जवाब थाः मैं दोस्तों के लिए बोझ नहीं बनना चाहता। न ही मैं परेशानी भरे फोन करके दिल्ली के अस्पतालों का तनाव और बोझ बढ़ाना चाहता हूं। अस्पताल पहले से चरमरा रहे हैं।

सुनील जैन की इन दो बातों के बीच संगति कैसे बैठाएंगे? उनके इस गुण को समझ कर कि वे अपने निर्णयों में व्यापक हित का ध्यान रखते थे।

शनिवार को सुनील के गुजरने के बाद मुझे जितने संदेश, फोन मिले हैं और सोशल मीडिया में उन पर जो लिखा गया है, उन सब में एक बात समान है। सब में उनकी संदेह से परे सच्चाई की चर्चा है। उन्होंने सत्य और अपनी आस्थाओं के रास्ते अपनी दोस्ती को कभी भी नहीं आने दिया। इस तरह अच्छी पत्रकारिता का मूल सिद्धांत उनके स्वभाव का हिस्सा था। यही कारण था कि लोग उनकी प्रशंसा करते थे। इसी वजह से उनके रिश्ते दुनिया भर में मजबूत थे।

राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री तथा व्यापार एवं उद्योग मंत्री से लेकर विपक्षी नेता और कॉरपोरेट मुखिया तक, सब के सब पेशे के प्रति सुनील की प्रतिबद्धता और विलक्षण अंतर्दृष्टि को लेकर एकमत थे। क्योंकि वे कभी भी अपने मन की बात कहने से डरते नहीं थे, नतीजा फिर चाहे जो भी हो। वे दूसरों से पहले रुझान पकड़ने में माहिर थे।

सरकारी पदों पर बैठे लोग सम्पादकों के सात सहमत नहीं होते। वे सुनील के साथ भी पूरी शिद्दत से असहमत होते थे। लेकिन उनके इरादों पर न तो वे संदेह नहीं करते थे, न ही उनके पाठक।

वे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, पीएसयू के विनिवेश की धीमी रफ्तार की आलोचना कर सकते थे। वह भी यह बताते हुअ कि जब नरेंद्र मोदी सत्ता में आए तो बीएसई के मार्केट कैप में उनका हिस्सा 22.5 था और अब यह घटकर महज 9 प्रतिशत रह गया है। वे जोर देकर कहते थे कि निजीकरण में एक-एक दिन के विलंब के लिए टैक्सपेयर को चुकाना पड़ रहा है। वे नए कृषि कानूनों के भी हिमायती थे। साफ कहते थे कि पंजाब के किसानों को सबसे ज्यादा लाड़-प्यार दिया गया है लेकिन उनकी उत्पादकता गिरती जा रही है। यह भी कहते थे कि किसान आंदोलन के पीछे कानूनों की नासमझी के अलावा मोदी सरकार को घेरने की कोशिश भी है ताकि कांग्रेस का बिगड़ा भविष्य संवरा जा सके।

उनके ऐसा सम्पादक विरला ही होता हैः हर हाल में संतुलित, खुला दिमाग, सभी विचारों के प्रति सम्मान, जूझने की हद तक स्वतंत्र और सीखने के लिए सदैव उद्धत। उनका हृदय निर्मल था। इतना निर्मल कि किसी को भी, यहां तक कि अपने विरोधी सम्पादकों को बुला लेते और कहते, “जरा यह बात मुझे समझा देना, प्लीज़”

यही कारण था कि सुनील के कॉलमों को कोई छोड़ना नहीं चाहता था। उनके विचार प्रभावकारी होते थे। वर्ष 2015 में उनके लेख, ‘नेट न्यूट्रैलिटी नॉनसेंस’ ने बड़ा तहलका मचाया था। मल्टीनेशनल बिग टेक, भारतीय और वैश्विक रेगुलेटर और फ्री इंटरनेट एक्टिविस्ट, इन सबकी खबर लेते हुए उन्होंने इन्हें पाखंडी करार दिया था। लेख में कोई दूसरा तार्किक रास्ता सुझाने को कहा गया था। ऐसा तरीका जो देश में ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए टेलीकॉम आपरेटरों को प्रोत्साहन दे। उन्होंने सरकार को स्पेक्ट्रम फीस के जरिए कैपिटल एक्सपेंडीचर दिए जाने को गलत ठहराया था।

आप मानें या न मानें। वे सम्मान के हकदार थे। अंतर्दृष्टि प्रदान करते थे।

बीती रात जब खबर मिली कि केयर्न ने 1.2 अरब डॉलर वसूलने के लिए एयर इंडिया को कोर्ट में घसीटा है तो मुझे सुनील का एक सुझाव और भविष्यवाणी याद आई, जो उसने दिसंबर में की थी। उन्होंने कहा था कि सरकार को कैयर्न के मामले में गलती नहीं करनी चाहिए। उम्मीद भर केंद्र सरकार इस आदेश को चुनौती देगी। यह गलती होगी। यह पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली के आश्वासन के खिलाफ होगा। जेटली ने अंतर्राष्ट्रीय आर्बिट्रेशन के फैसलों का सम्मान करने की बात कही थी।

सुनील के विचार अप्रत्याशित तो थे पर वे आर्थिक उदारवाद की निरंतर आवाज थे। आज जब एयर इंडिया के (प्रॉक्सी) बहाने भारत सरकार पर 1.2 अरब डालर भुगताने के लिए दबाव डाला जा रहा है, मैं कल्पना कर सकता हूं सुनील एक लेख लिख रहा है…मैंने पहले ही बता दिया था न…।

सुनील तब तक लिखते रहे जब तक मुमकिन रहा। मैंने कहा भी, इतना बीमार हो, फिर क्यों लिखते हो। उन्होंने कहा, न्यूज़-रूम में स्टाफ कम है, मैं चाहता हूं कि जितना ज्यादा कर पाऊं, अच्छा होगा। एक ऐसे वक्त में जब वे और उनका परिवार कोविड-19 से जूझ रहा था, वे अपनी स्पष्टवादी पहचान के साथ वे वैक्सीनों के लिए मुक्त बाजार मूल्य निर्धारण की हिमायत करते रहे।

कोविड से जूझते हुए लिखे अपने अंतिम कॉलम में सुनील ने लिखा कि हर मौत को सरकार के ऊपर सियासी हमले का हथियार नहीं बना देना चाहिए। अगर हम युद्ध करेंगे तो भारत को ज्यादा नुकसान सहना होगा। ‘कोविड इज़ दि एनिमी, नॉट द गवर्नमेंट’ इस शीर्षक के साथ लिखे लेख में उन्होंने कहा था कि सरकार साफ तौर पर अलग-थलग पड़ गई है।

उनके जाने से हम दुश्मन से एक लड़ाई हार गए हैं। मैंने एक दोस्त और सम्पाद खो दिया है, जिसके साथ मुझे सीखने और काम करने का मौका मिला था।

खोने का भाव जरा गहरा है, जो निजी होने के साथ प्रोफेशन से भी जुड़ा है। सुनील अत्यंत गुणी संपादक थे। यह सोचते ही लगता है कि उनकी भरपाई असंभव है।

सुनील ने जो प्रतिबद्धता और क्षमता न्यूज़-रूम को प्रदान की, गुजरे साल की कठिनाई में भी, उसे मैं बड़े उदासीन भाव से लेता था। लेकिन उनके यही गिफ्ट हमारी विरासत हैं। हमारी जिम्मेदारी है कि हम इन गुणों को और निखारें।

आज के जैसे दिन और रात हमें नैराश्य से भर देते हैं। ये हमें याद दिलाते हैं कि हमे अपने जीवन पर कितना नगण्य नियंत्रण है। सुनील के आत्मविश्वास और सत्ता के सामने सच बोलने के साहस के पीछे उसकी पत्नी नमिता और पुत्र अभिनव का बहुत बड़ा हाथ है। मेरे मन में उनके पूरे परिवार के लिए बड़ी प्रशंसा है। उनके दोस्तों के प्रति भी जिनके बारे में सुनील ने बताया था वे उनकी देखभाल कर रहे हैं…बस इशारा किया नहीं कि काम हुआ। एम्स के आइसीयू में जाने से पहले उसने कुछ दोस्तों को मेसेज किया थाः “बस, ज़ोर लगाए हूं…चमत्कार की उम्मीद कर रहा हूं…ज्यादा कुछ करने को है नहीं सो भीमसेन जोशी को सुन रहा हूं।” जैसे पंडित जोशी जी अपने सुरों में जिंदा रहेंगे, सुनील अपने शब्दों में हमेशा बसे रहेंगे।

यह स्‍मृत‍ि-लेख 17 मई, 2021 के इंड‍ियन एक्‍सप्रेस में My friend, my editor शीर्षक से प्रकाश‍ित हुआ है। अनंत गोयनका एक्‍सप्रेस समूह के इग्‍जेक्‍युट‍िव डायरेक्‍टर और द फाइनेंश‍ियल एक्‍सप्रेस के प्रकाशक हैं।