अनुशासनहीनता का मामला : कार्रवाई हो, पर पक्ष भी सुना जाए

अनुशासन खेल का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। अगर अनुशासन टूटता है तो नुकसान खेल और खिलाड़ी दोनों को झेलना पड़ता है।

विनेश फोगाट। फाइल फोटो।

सुरेश कौशिक

अनुशासन खेल का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। अगर अनुशासन टूटता है तो नुकसान खेल और खिलाड़ी दोनों को झेलना पड़ता है। अनुशासनहीनता की बड़ी वजह होती है अहम। खिलाड़ी जब स्टारडम पा लेता है तो अपने को खेल से बड़ा समझने लगता है। दूसरी ओर खेल को चलाने वाले पदाधिकारी भी अपने को बादशाह से कम नहीं समझते। जब कोई उलझन आती है तो जांच होने लगती है। सवाल और जवाब पहले ही मीडिया की सुर्खियां बन जाते हैं। इस बार तो यह भी कमाल देखने को मिल गया कि खिलाड़ी के स्पष्टीकरण से पहले ही निलंबन का फरमान जारी हो गया। इस पर मंथन की जरूरत है।

ओलंपिक में महिलाओं का प्रदर्शन सुर्खियां बना तो भारतीय खिलाड़ियों की अनुशासनहीनता के जो तीन मामले आए, वह भी महिलाओं को लेकर रहे। इनके लपेटे में आई महिला पहलवान विनेश फोगाट, सोनम मलिक और टेबल टेनिस खिलाड़ी मनिका बत्रा। यह ठीक है कि पहली निगाह में विनेश फोगाट, सोनम मलिक और मनिका बत्रा तीनों का आचरण सहीं नहीं था। साफ है कि इन तीनों ने अनुशासनहीनता की। कार्रवाई होनी चाहिए। आमतौर पर इसके लिए खेल फेडरेशन की अनुशासन समिति होती है। जांच के बाद सजा भी वही सुनाती है। इसलिए प्रक्रिया पूरी होने से पहले मामला मीडिया में जाना भी उचित प्रतीत नहीं होता। पहले ही फैसला सुना देना भी ठीक नहीं लगता। खिलाड़ी कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसे बख्शा नहीं जाना चाहिए। पर इस बात से परहेज करना चाहिए कि खिलाड़ी से बात किए बिना उसकी प्रतिष्ठा पर चोट हो।

अब विनेश फोगाट का ही मामला लीजिए। एक तरफ तो उससे स्पष्टीकरण मांगा गया और दूसरी ओर निलंबन की घोषणा भी कर दी गई। ऐसे उतावलेपन से बचना चाहिए। विनेश फोगाट कोई छोटी पहलवान नहीं हैं। फ्रीस्टाइल के 53 किलो वर्ग में वह दुनिया की नंबर वन पहलवान हैं। उन्होंने विश्व चैंपियनशिप में भी पदक जीते हैं। ओलंपिक में पदक जीतना उनका सपना था जो लगातार दूसरे ओलंपिक में टूट गया। 2016 के रियो ओलंपिक में उनका यह सपना तब चकनाचूर हो गया था जब वह क्वार्टर फाइनल में चोटिल होकर पदक दौड़ से बाहर हो गई थीं।

लेकिन बीते कुछ वर्षों में इस झटके से उबरकर उन्होंने सफल वापसी कर कई पदक जीते। इस बार तोक्यो में उनसे स्वर्ण की उम्मीद थी। सब कुछ सही चल रहा था। हंगरी में ट्रेनिंग कर वह तोक्यो पहुंची थीं। वहां पहुंचकर निजी फिजियो की ओलंपिक में जरूरत को लेकर मामला फंसा। बात नहीं मानी गई तो बड़ी पहलवान होने के नखरे दिखाते हुए उन्होंने हंगामा किया। खेल गांव में रहने को लेकर, फिर साथी पहलवानों के साथ ट्रेनिंग नहीं करने का मामला गरमाया और फिर ओलंपिक में टीम स्पांसर की जर्सी पहनकर नहीं लड़ना भी बड़ा मुद्दा बन गया।

अपनी शारीरिक और मानसिक स्थिति को खिलाड़ी से बेहतर कोई नहीं जान सकता। अगर कोई परेशानी हो तो बातचीत से ही समस्या का हल निकाला जा सकता है। जब निलंबन की घोषणा हो गई तो फोगाट को मानसिक और शारीरिक परेशानी का कार्ड खेलना पड़ा। दोनों महिला पहलवानों ने अपने किए पर खेद प्रकट कर दिया है। अब गेंद फेडरेशन के पाले में है।

यों विनेश को पहले ही यह मुद्दा फेडरेशन के पदाधिकारियों, कुश्ती प्रशिक्षक या दल नायक के समक्ष ले जाना चाहिए था। तब हो सकता था कि उनकी मांग पर सहानुभूतिपूर्वक विचार हो जाता क्योंकि वह हमारी स्वर्ण पदक की दावेदार पहलवान थीं। इससे एक और सवाल खड़ा होता है, वह है आपसी समन्वय का अभाव। ऐसे महत्त्वपूर्ण खेल मेले में यह जरूरी है कि खिलाड़ियों और अधिकारियों में तालमेल हो।

टेबल टेनिस खिलाड़ी मनिका बत्रा ने जो आचरण किया, वह बिल्कुल भी सही नहीं था। विभिन्न खेलों के साथ प्रशिक्षक की नियुक्ति की जाती है। आप कोई आमंत्रण टूर्नामेंट में नहीं खेल रहे, ओलंपिक में देश की नुमाइंदगी कर रहे हो। फिर आप पदक के प्रबल दावेदार खिलाड़ी भी नहीं थे कि निजी कोच की मौजूदगी पर अड़ें। कोच के रूप में सौम्यदीप राय स्टेडियम में मौजूद थे पर मनिका ने उनकी सेवाएं लेने से इनकार कर दिया। यह कोच का ही नहीं, राष्ट्र का भी अपमान है। आप पर देश की साख बढ़ाने की जिम्मेदारी है, गिराने की नहीं। ऐसी खिलाड़ियों की अकड़ को ठिखाने लगाने की जरूरत है।

पहली निगाह में विनेश फोगाट, सोनम मलिक और मनिका बत्रा तीनों का आचरण सहीं नहीं था। साफ है कि इन तीनों ने अनुशासनहीनता की। कार्रवाई होनी चाहिए। आमतौर पर इसके लिए खेल फेडरेशन की अनुशासन समिति होती है। जांच के बाद सजा भी वही सुनाती है। इसलिए प्रक्रिया पूरी होने से पहले मामला मीडिया में जाना भी उचित प्रतीत नहीं होता। पहले ही फैसला सुना देना भी ठीक नहीं लगता। खिलाड़ी कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसे बख्शा नहीं जाना चाहिए।