अफगान सिख, हिंदुओं का एलान, हमें तालिबान पर भरोसा नहीं

अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा सत्ता पलट के बाद वहां बरसों से रह रहे सिख समुदाय के लोग चिंतित हैं।

यास्मीन निगार खान। फाइल फोटो।

दिव्या गोयल

अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा सत्ता पलट के बाद वहां बरसों से रह रहे सिख समुदाय के लोग चिंतित हैं। उनका कहना है कि हालांकि तालिबान हुकूमत ने उन्हें पूर्ण सुरक्षा का भरोसा देते हुए वहीं रहने को कहा है पर वहां के दिन पर दिन बदतर होते देख उन्हें दहशत हो रही है। इसीलिए वे शीघ्र ही इस देश से निकलना चाहते हैं। वहां रह रहे करीब 280 सिख और 30-40 हिन्दू काबुल स्थित गुरुद्वारा दशमेश पिता श्री गुरुगोबिंद सिंह जी सिंह सभा कारते परवान में शरण लिए हुए हैं।

गुरुद्वारा के अध्यक्ष गुरनाम सिंह ने जनसत्ता को फोन पर बताया कि सिख समुदाय के नेताओं ने कल ही गुरुद्वारे में तालिबान हुकूमत के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की थी। इस बैठक में तालिबान ने उन्हें शांति और सुरक्षा का भरोसा दिया। उन्होंने यह भी कहा कि हमें देश छोड़ कर जाने की जरूरत नहीं है हम लोग वहां शांतिपूर्वक रह सकते हैं। उन्होंने यह भी वादा किया कि हम लोग अपने धार्मिक रस्मोरिवाज भी जारी रख सकते हैं, वह इसमें कोई दखल नहीं देंगे। उन्होंने हमें एक फोन नंबर भी दिया है और कहा है कि कोई भी समस्या आने पर हम इस नंबर पर तुरंत संपर्क कर सकते हैं। गुरनाम सिंह ने कहा गजनी और जलालाबाद में रह रहे सिख और हिन्दू परिवार भी अब काबुल आ गए हैं और यहां दो गुरुद्वारों कारते परवान और गुरुद्वारा मनसा सिंह जी में शरण लिए हुए हैं।

अफगानिस्तान में कभी सिख और हिन्दू समुदाय के करीब एक लाख लोग रहते थे। लेकिन 1992 में मुजाहिद्दीन द्वारा अफगानिस्तान पर कब्जा किए जाने के बाद वहां से बहुत से हिंदू और सिख पलायन कर भारत आ गए। बाद में 1996 से लेकर 2001 तक तालिबान के शासन के दौरान भी वहां रह रहे सिख और हिंदू समुदाय के लोगों की परेशानियां कम नहीं हुईं। इसके बाद 2018 और 2020 में हुए दो बड़े हमलों के दौरान बहुत से सिख और हिंदू अफगानिस्तान छोड़ने को मजबूर हो गए। एक जुलाई, 2018 को जलालाबाद में एक आत्मघाती बम विस्फोट में 19 सिख और हिंदू मारे गए।

इसके बाद 25 मार्च, 2020 को इस्लामिक स्टेट से संबंधित आतंकवादी ने काबुल के शोर बाजार में स्थित गुरुद्वारा हर राय साहब में घुस कर गोलियां चलानी शुरू कर दीं जिसमें 25 लोगों की मौत हो गई। उस समय अफगानिस्तान में सिख और हिन्दू समुदाय के लोगों की संख्या 700 रह गई थी और इस हमले के बाद उनमें से 400 लोग अलग-अलग गुटों में पलायन कर भारत आ गए थे। कारते परवान गुरुद्वारा के एक सदस्य छबोल सिंह जोकि अब परिवार सहित दिल्ली में रह रहे हैं, ने कहा, ‘अब वहां सिर्फ 280 सिख और मुट्ठीभर हिन्दू रह गए हैं। 2020 में गुरुद्वारा में हुए हमले के बाद 400 लोग वापस आ गए थे।’ अब हालत यह है कि तालिबान के शांति और सुरक्षा के अश्वासन के बावजूद वहां रह रहे सिख समुदाय के लोग भारत वापस आने को तैयार हैं। उन्हें तालिबान के पिछले शासन के दौरान हुई ऐसी कई घटनाएं अभी भी याद हैं जिनमें तालिबान के लोग सिखों के चेहरों पर थूक देते और उन्हें इस्लाम कबूल करने को कहते थे।

अफगानिस्तान में रह रहे सिख समुदाय के प्रवक्ता ने बताया कि अभी तो वे तालिबान हुकूमत के वादे पर चुप बैठे हैं। लेकिन अगर भारत, कनाडा, अमेरिका या किसी अन्य देश में जाने का मौका मिला तो वे तुरंत यहां से निकल जाएंगे। सिख समुदाय के एक व्यक्ति ने बताया, ‘इस समय यहां सभी उड़ानें बंद हैं, हमारे पास यहां से निकलने का कोई रास्ता नहीं है। सिखों के लिए वैसे भी यहां जीवन आसान नहीं था। तालिबान की सत्ता हो या लोकतांत्रिक सरकार, दोनों में उनके साथ दुर्व्यवहार ही किया जाता रहा है। राष्ट्रपति अशरफ गनी के शासन के दौरान भी उनपर दो बढ़े हमले हुए। अब तालिबान के शासन में तो हमारे लिए और भी ज्यादा मुश्किलें आ सकती हैं। हम भारत या अन्य देश की सरकारों से हमें यहां से निकालने का इंतजार कर रहे हैं।’

भारत के पख्तूनों से त्राहिमाम संदेश आ रहे हैं : सीमांत गांधी की प्रपौत्री

‘सीमांत गांधी’ खान अब्दुल गफ्फार खान की कोलकाता में रह रहीं प्रपौत्री यास्मीन निगार खान ने मंगलवार को कहा कि उन्हें भारत भर में रहने वाले पख्तूनों के त्राहिमाम संदेश (एसओएस) मिल रहे हैं जिनमें विदेश मंत्रालय से अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद वहां रह रहे उनके परिजनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का अनुरोध किया जा रहा है। पीढ़ियों से मध्य कोलकाता में रह रहीं खान (50) आॅल इंडिया पख्तून जिरगा-ए-हिंद की अध्यक्ष हैं जो देश में समुदाय की शीर्ष संस्था है।

बीती दो रात से बमुश्किल सोईं खान ने बताया, ‘हम केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार के लगातार संपर्क में हैं, लेकिन स्थिति लगातार तेजी से बदल रही है और अफगानिस्तान से बहुत कम जानकारी बाहर आ रही है। फोन लाइनें बंद हैं और काबुल की तस्वीरें परेशान करने वाली हैं। जो लोग भारत में रह रहे हैं, वे व्याकुल हैं।’ उन्होंने कहा कि राज्य के 1000 पख्तूनों और देश के अन्य हिस्सों में पीढ़ियों से रह रहे लाखों लोगों के पास अपने मूल स्थान लौटने का कोई मौका नहीं है, लेकिन लगभग सभी के रिश्तेदार अफगानिस्तान या पश्चिमोत्तर पाकिस्तान में हैं।