आरोपों से बचने के लिए बंद की दुकान लेकिन 250 रुपए में गंवा दी CM पद की कुर्सी, अनोखी है इस राजनेता की कहानी

महज 249 रुपए और 72 पैसे में सीएम पद की कुर्सी गंवाने वाले इस राजनेता की कहानी आपको हैरान कर देगी।

Dwarka Prasad Mishra द्वारका प्रसाद मिश्र ने महज 249 रुपए और 72 पैसे में सीएम पद की कुर्सी गंवा दी थी। (फोटो सोर्स-Alchetron)

डीपी मिश्र यानी द्वारका प्रसाद मिश्र मध्य प्रदेश की राजनीति का बड़ा नाम थे। वह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे लेकिन उन्हें एक ऐसे राजनेता के रूप में भी याद किया जाता है, जिन्होंने महज 249 रुपए और 72 पैसे की वजह से सीएम पद गंवा दिया था। इस किस्से का जिक्र वासुदेव चंद्राकर की जीवनी नाम की किताब में है। जिसके लेखक रामप्यारा पारकर, अगासदिया और डॉ परदेशीराम वर्मा हैं।

दरअसल 25 मार्च 1969 को मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेशचंद्र सिंह ने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद राजनीति के गलियारों में ये खबर फैल गई थी कि द्वारका प्रसाद मिश्र फिर से प्रदेश के सीएम बनने वाले हैं। क्योंकि कांग्रेस का पूरा कंट्रोल उस समय द्वारका प्रसाद मिश्र के हाथ में ही था।

नरेशचंद्र सिंह मध्य प्रदेश के पहले और इकलौते आदिवासी मुख्यमंत्री थे लेकिन वह सीएम पद पर केवल 13 दिनों तक ही रहे। 14वें दिन उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया और फिर एक तरीके से संन्यास ले लिया।

12 मार्च 1969 को तत्कालीन सीएम गोविंद नारायण सिंह ने इस्तीफा दे दिया था, इसके बाद 13 मार्च को नरेशचंद्र सिंह मुख्यमंत्री बने थे लेकिन 13 दिन बाद 25 मार्च को उन्हें भी पद छोड़ना पड़ा।

इसी दौरान कुछ ऐसा हुआ, जिससे मध्य प्रदेश की राजनीति का पूरा समीकरण ही बदल गया। कमलनारायण शर्मा की याचिका पर फैसला आया और ये सिद्ध हो गया कि डीपी मिश्रा द्वारा कसडोल के उपचुनाव में अनियमितताएं बरती गईं, जिसका नतीजा ये हुआ कि इस चुनाव को अवैध घोषित कर दिया गया।

कमलनारायण शर्मा को डीपी मिश्र के खिलाफ मिल गया था अहम सबूत: कसडोल के उपचुनाव में डीपी मिश्र के चुनाव एजेंट श्यामचरण शुक्ल थे, लेकिन जब डीपी मिश्र चुनाव जीत गए तो उनकी टीम से चुनाव पर किए जाने वाले खर्चों के बिल कहीं खो गए।

बाद में कमलनारायण शर्मा ने इस जीत के खिलाफ याचिका दायर की और शर्मा को कहीं से 6300 रुपए का एक बिल मिल गया, जिस पर डीपी मिश्र के चुनाव एजेंट श्यामचरण शुक्ल के हस्ताक्षर थे।

यहीं से इस चुनाव का पूरा गणित ही बदल गया। हालांकि कहा ये भी जाता है कि श्यामचरण शुक्ल ने डीपी मिश्र को धोखा दिया था और अहम दस्तावेज कमलनारायण शर्मा को उपलब्ध करवाए थे।

इसके बाद मई 1963 में कसडोल उपचुनाव को निरस्त कर दिया गया, क्योंकि ये पाया गया कि डीपी मिश्र ने चुनाव के लिए निर्धारित रकम से 249 रुपए और 72 पैसे ज्यादा खर्च किए थे। जबलपुर हाई कोर्ट ने इस मामले के सामने आने के बाद डीपी मिश्र को 6 साल के लिए चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य साबित कर दिया। कोर्ट के इस फैसले ने डीपी मिश्र के पूरे राजनीतिक जीवन को बदलकर रख दिया।

हालांकि बाद में मिश्र इंदिरा गांधी के सलाहकार रहे और बाद में राजीव गांधी के समय भी काफी एक्टिव दिखे।

आरोपों से बचने के लिए दुकान कर दी थी बंद: डीपी मिश्र के बारे में एक बात और बहुत फेमस है कि वह जब मध्य प्रदेश के सीएम बने तो उनके बड़े बेटे ने भोपाल में अपनी चलती हुई दवा की दुकान को बंद कर दिया। इस बात का जिक्र ‘पेज 161 मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश के’ नाम की किताब में है। इसके लेखक मायाराम सुरजन हैं।

इस दुकान का नाम जानकी फार्मेसी था और ये भोपाल में हमीदिया अस्पताल के पास थी। इसके पीछे की वजह ये सुनने में आई कि कोई मिश्र पर ये आरोप ना लगा सके कि जानकी फार्मेसी में हमीदिया अस्पताल की जरूरतें पूरी की जा रही हैं।

पिता के लिए बेटे की ये कुर्बानी उस वक्त में काफी चर्चा का विषय बनी थी क्योंकि वो दुकान काफी चलती थी और डीपी मिश्र के बेटे ने अपने पिता की प्रतिष्ठा के लिए उस दुकान को बंद कर दिया था।

इसके अलावा डीपी मिश्र जब सीएम बने थे, तब सानौधा में दुर्गावती बोर्ड इंडस्ट्री भी बंद कर दी गई थी क्योंकि डीपी मिश्रा हमेशा कहते थे कि राजनीति में काम करने वाले लोगों को कभी व्यापार नहीं करना चाहिए।