कूकाबुरा गेंद का सफर

इस कंपनी की शुरुआत 1890 में एजी थॉमसन ने की थी। उस वक्त यह कंपनी घोड़े की हार्नेस और काठी बनाने का काम करती थी।

कूकाबुरा गेंद। फाइल फोटो।

इस कंपनी की शुरुआत 1890 में एजी थॉमसन ने की थी। उस वक्त यह कंपनी घोड़े की हार्नेस और काठी बनाने का काम करती थी। बाजार में कारों के आने के बाद कंपनी संकट के दौर से गुजरने लगी तो उसने क्रिकेट गेंद बनाना शुरू किया। आॅस्ट्रेलिया के मेलबर्न में शुरू हुई कंपनी आज क्रिकेट और हॉकी गेंद के अलावा इन खेलों से जुड़े सामान को बनाने के लिए ही जानी जाती है। एकदिवसीय और टी-20 में इस्तेमाल होने वाली सफेद गेंद सबसे पहले 1978 में बनी। इसे कूकाबुरा ने ही बनाया था। 2015 में पहली बार टैस्ट में गुलाबी गेंद का इस्तेमाल हुआ। इसे भी कूकाबुरा ने ही बनाया था।

कूकाबुरा गेंद आॅस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, साउथ अफ्रीका, न्यूजीलैंड, श्रीलंका, बांग्लादेश, जिंबाब्वे और अफगानिस्तान टैस्ट मैच के लिए इस्तेमाल करते हैं। यह आॅस्ट्रेलिया में बनाई जाती है। इसकी सिलाई मशीन से होती है। इसकी सीम दबी हुई होती है। शुरुआती 20 से 30 ओवर यह गेंद तेज गेंदबाजी के लिए बेहतर होती है। इसके बाद यह बल्लेबाजी के लिए बेहतर होती है। सीम दबी होने के कारण यह गेंद स्पिनरों के लिए अन्य गेंदों की तुलना में कम मददगार होती है।

इंग्लैंड, आयरलैंड और वेस्ट इंडीज में ड्यूक बॉल का इस्तेमाल होता है। वहीं भारत में होने वाले मैचों में एसजी गेंद का इस्तेमाल होता है। ड्यूक गेंद इंग्लैंड में बनती है। इसकी सीम उभरी हुई होती है। इसकी सिलाई हाथ से होती है। इसकी हार्डनेस 60 ओवर तक बनी रहती है। इस गेंद को तेज गेंदबाजों के लिए मददगार माना जाता है। इससे 20 से 30 ओवर बाद ही रिवर्स स्विंग मिलने लगती है। कूकाबुरा और एसजी गेंद 50 ओवर के आसपास रिवर्स स्विंग होनी शुरू होती हैं। कंपनी इंटरनेशनल क्रिकेट शुरू होने से 117 साल पहले, यानी 1760 से ड्यूक गेंद बना रही है।

भारत अकेला देश है जो एसजी गेंद का इस्तेमाल करता है। ये गेंद भारत में ही बनती है। इस गेंद की सीम उभरी हुई होती है। इसकी सिलाई भी ड्यूक की तरह हाथ से की जाती है। इस गेंद को स्पिनर्स के लिए मददगार माना जाता है। नए बदलावों के बाद इससे स्पिनर्स के साथ ही तेज गेंदबाजों को भी मदद मिलने की उम्मीद है।