कैसे जयप्रकाश नारायण ने शुरू किया था आंदोलन, जिसने इंदिरा गांधी से छीन ली थी सत्ता, पूरा किस्सा

जयप्रकाश नारायण जब आंदोलन करने उतरे तो इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल होना पड़ा था। आजादी के बाद पहली बार किसी सरकार के खिलाफ इतने बड़े पैमाने पर लोग सड़कों पर उतरे थे।

jaiprakash narayan जयप्रकाश नारायण (फोटो- एक्सप्रेस आर्काइव)

संपूर्ण क्रांति के नायक जयप्रकाश नारायण ने जब आंदोलन किया तो उस समय की सबसे ताकतवर नेता इंदिरा गांधी के सामने से सत्ता छिन गई थी। पाकिस्तान के दो टुकड़े करके नया देश बांग्लादेश बनाने वाली आयरन लेडी ऑफ इंडिया, इंदिरा गांधी ना तो जेपी को मना पाईं और ना उनका आंदोलन रोक पाईं।

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है- रामधारी सिंह दिनकर की इन पंक्तियों को जेपी ने अपने आंदोलन के नारों में शामिल कर लिया था। जेपी के जज्बे ने देश की राजनीति की हवा का रुख ही पलट दिया था। उसी दशक में ‘इंडिया इज इंदिरा और इंदिरा इज इंडिया’ भी कहा जाता था। लेकिन जेपी के आंदोलन में यह खत्म हो गया।

कैसे शुरू हुआ आंदोलन: बढ़ती महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता लगातार आक्रोश में थी। देश के कई हिस्सों में छात्र प्रदर्शन कर रहे थे। गुजरात में कांग्रेस सरकार के खिलाफ छात्रों ने आंदोलन छेड़ दिया था। जनवरी 1974 में शुरू यह आंदोलन पुलिसिया कार्रवाई के बाद और भड़क गया। इंदिरा गांधी को मजबूरन राज्य की कांग्रेस सरकार को हटाकर वहां राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा। इस आंदोलन को जेपी का साथ मिला था। गुजरात से शुरू हुआ ये आंदोलन अब बिहार की राजधानी पटना तक पहुंच गया। बिहार में छात्र नेता मार्च में होने वाले विधानसभा सत्र में राज्यपाल को रोकने की तैयारी कर चुके थे। जयप्रकाश ने पहले इस आंदोलन को अपना समर्थन दिया और बाद में नेतृत्व किया। इस दौरान भी पुलिस ने बल प्रयोग किया।

बिगड़ते रिश्ते- द ड्रीम ऑफ रेगुलेशन: ए बायोग्राफी ऑफ जयप्रकाश नारायण में बिमल प्रसाद और सुजाता प्रसाद लिखते हैं- जयप्रकाश जब सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते तो परोक्ष या अपरोक्ष रूप से उनका निशाना इंदिरा ही होती थीं। जेपी के भाषणों का इंदिरा पर भी गहरा प्रभाव पड़ा था। उनके बीच की कड़वाहट भी बढ़ती जा रही थी। बात तब और बिगड़ गई जब भुवनेश्वर की एक जनसभा में इंदिरा ने अपने विरोधियों पर भ्रष्ट लोगों की उदारता पर जीने का आरोप लगा दिया था।

इंदिरा के इस भाषण का जेपी पर बहुत प्रभाव पड़ा। ये कोई साधारण टिप्पणी नहीं थी, जिसे नजरअंदाज किया जा सकता था। दो दिन बाद जारी एक बयान में जयप्रकाश ने कहा कि इंदिरा निम्न स्तर के आरोप लगा रही हैं। जब इंदिरा को महसूस हुआ कि उनसे गलती हुई है तो उन्होंने इसे सुधारने की कोशिश भी की। उन्होंने जेपी को एक खत लिखा, जिसमें नेहरू से उनके मधुर संबंधों को याद दिलाया गया।

इंदिरा की चिट्ठी: “कई दोस्त इस बात से परेशान हैं कि हमारे बीच कोई गलतफहमी हो जाए। मुझे आपकी मित्रता का सौभाग्य कई वर्षों से मिला है। मेरे पिता और आपके बीच जो पारस्परिक संबंध था, वह मेरी मां का प्रभावती जी के प्रति स्नेह के रूप में जाना जाता है। हमने एक-दूसरे की आलोचना की है, लेकिन मुझे उम्मीद है कि हमने इसे व्यक्तिगत कड़वाहट या एक-दूसरे के इरादों पर सवाल उठाए बिना किया है।”

बेअसर रही चिट्ठी: इंदिरा के इस खत का जेपी पर प्रभाव नहीं पड़ा। जवाब तो उन्होंने दिया, साथ ही सरकार पर और आरोप लगा दिए। लोकपाल की मांग की गई और इंदु का संबोधन अब इंदिरा जी में बदल गया था। इसके बाद इंदिरा गांधी ने भी जवाब दिया मगर तब तक जेपी इंदिरा के खिलाफ पूरी तरह से उतरने की तैयारी कर चुके थे। इंदिरा ने अपने पत्र में लिखा था- ‘आप नाराज हैं कि प्रधानमंत्री से लेकर श्री दीक्षित तक के लोगों में ‘जयप्रकाश नारायण को लोकतंत्र की सीख देने का अहंकार’ है। क्या आप इस बात से सहमत नहीं होंगे कि लोकतंत्र हमें इसके बारे में सोचने और बात करने का अधिकार देता है, जैसा कि यह किसी और को देता है, चाहे स्थिति या पृष्ठभूमि कुछ भी हो? मैं पूरी विनम्रता के साथ आपसे यह भी कह सकती हूं कि अन्य लोग, जो आपके अनुयायी नहीं हो सकते हैं, देश के बारे में, लोगों के कल्याण के बारे में समान रूप से चिंतित हैं।

संपूर्ण क्रांति का आह्वान- इस पत्र का जेपी पर कोई असर नहीं पड़ा और उन्होंने सात जून को सत्याग्रह की घोषणा कर दी। जेपी ने संपूर्ण क्रांति का नारा देते हुए आंदोलन का बिगुल फूंक दिया। जयप्रकाश ने सभी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को एक साल के लिए बंद करने का आह्वान कर दिया। उन्होंने सरकार को पंगु बनाने के लिए नो-टैक्स की बात भी कही। जेपी ने पुलिसकर्मियों को भी अपने विवेक से चलने के लिए कहा।

जेपी की इन बातों का जनता पर गहरा असर पड़ा, वो जेपी के साथ आने लगी। लोग पहले ही गुस्से से भरे थे, जेपी की बातों और उनके आंदोलन ने सरकार के खिलाफ इन्हें अपनी आवाज को बुलंद करने का एक जरिया दे दिया था।

आंदोलन का दमन- आंदोलन के दौरान जयप्रकाश बार-बार कह रहे थे कि यह आंदोलन लोकतांत्रिक और अहिंसक है। लेकिन पूरी तरह से ऐसा नहीं था। दुकानदारों के शटर जबरदस्ती बंद कराए गए। ट्रेनों और बसों को मनमाने ढंग से रोका गया। भभुआ, सासाराम, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर और दानापुर स्टेशनों पर रेलवे ट्रैक जाम कर दिया गया। तब बिहार के गृह सचिव ने रेलवे तोड़फोड़, पटरियों से छेड़छाड़ और रेल कर्मियों को डराने-धमकाने के बीस मामले दर्ज करवाए थे।

पुलिस ने बेरहमी से जवाबी कार्रवाई की। सैकड़ों छात्रों को पीटा गया और गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार लोगों में कई महिलाएं और लड़कियां भी शामिल थीं। कैदियों को हजारीबाग, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, समस्तीपुर, आरा, बांकीपुर और पटना की जेलों में रखा गया था। 2 से 5 अक्टूबर के बीच पुलिस ने कई जगहों पर गोलियां चलाईं, जिसमें कई मौतें हुईं।

इमरजेंसी लागू- आंदोलन के बीच ही एक और घटना हुई। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी को चुनावी कानूनों के उल्लंघन का दोषी पाया और उनके चुनाव को रद्द कर दिया। इसके बाद जेपी ने इंदिरा गांधी से इस्तीफा मांग लिया, लेकिन वो इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गईं। अदालत से इंदिरा को थोड़ी राहत तो मिली लेकिन जेपी की तरफ से उनके लिए कोई राहत नहीं थी। 25 जून को जेपी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक रैली की।

अपने खिलाफ जन आंदोलनों और जेपी के तेवर से घबराई, इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को इमरजेंसी की घोषणा कर दी। विरोध कर रहे नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। जेपी समेत करीब 600 नेताओं को जेल में डाल दिया गया। इसके बाद इंदिरा गांधी ने 1977 में आपातकाल को खत्म करते हुए आम चुनावों की घोषणा कर दी। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की पार्टी कांग्रेस को प्रदर्शन बहुत ही खराब और वह सत्ता से बाहर हो गई। यह वही समय था जब पहली बार देश में गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी।