कोरोना काल में “फरिश्ता” बना यह पूर्व MLA, जिनकी संक्रमण से घर पर हो जा रही मौतें, उन्हें दफनाने का टीम के साथ संभाल रखा है काम

उन्होंने कहा कि पिछले दस दिनों में मैंने कई भयावह दृश्यों को देखा है। मैंने ऐसी हालत कभी नहीं देखी थी। मैंने छोटी लड़कियों को अपने पिता के शरीर को अंतिम संस्कार के लिए ले जाते देखा है।

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कोरोना संकट के दौर में जहां कुछ राजनेताओं की चर्चा उनके संवेदनहीनता के लिए हो रही है वहीं कुछ ऐसे हैं जो जनता के साथ इस दुख के समय दिन-रात काम कर रहे हैं। दिल्ली के शाहदरा से विधायक रह चुके जितेंद्र सिंह शंटी लोगों के लिए इस दौर में “फरिश्ता” बन कर सामने आए हैं। शंटी लोगो को दफनाने की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

जितेंद्र सिंह शंटी का मोबाइल फोन लगातार बज रहा है। शुक्रवार दोपहर में आया यह 30 वां कॉल था। शंटी को एक दिन में औसत 500 फोन कॉल आ रहे हैं। अभी जो फोन आया था वो छह लोगों के एक परिवार की तरफ से किया गया था। इस परिवार के सभी छह सदस्य कोरोना संक्रमित हैं उनके दादाजी का निधन हो गया है। और वो उनके शव के साथ घर में बंद हैं। उनके अंतिम संस्कार के लिए कोई उपलब्ध नहीं है।

फोन पर जवाब देते हुए शंटी ने कहा कि मैं वहाँ आ रहा हूं। हम शव का अंतिम संस्कार करेंगे। आप इस समय अकेले नहीं हैं। कृपया आप आराम करें। सब ठीक हो जाएगा। शंटी का परिवार भी इस वायरस की चपेट में है। उनके बेटे और पत्नी कोरोना संक्रमित पाए गए हैं। उनके चार कर्मचारी भी संक्रमित हैं उनके ड्राइवर की मौत कोरोना से हो चुकी है। शंटी स्वयं झिलमिल कॉलोनी के एक पार्किंग में कार में ही सो रहे हैं।

उन्होंने सीमापुरी श्मशान में एक ऑफिस बना रखा है। जहां वे अपने संगठन शहीद भगत सिंह सेवा दल के 22 स्वयंसेवकों के साथ काम में लगे हुए हैं। शंटी का कहना है कि उन्होंने अप्रैल के महीने में 800 से अधिक शवों का अंतिम संस्कार किया है। साथ ही उन्होंने कहा कि एक परेशान करने वाली बात ये है कि घरों में जिनकी मौत हो रही है उनमें अधिकतर 30 साल तक के युवा हैं। ऑक्सीजन की कमी के कारण उनकी मौत हो रही है।

हर दिन शंटी और उनकी टीम सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से मरने वालों के बारे में पता करते हैं और फिर उसके घर पहुंच कर स्थानीय कर्मचारियों की मदद से उन्हें अंतिम संस्कार के लिए ले जाते हैं। 32 साल के राजा हाशमी उनकी टीम में एक स्वयंसेवक के रूप में काम करते हैं। वो एक निजी कॉलेज में शिक्षक हैं। वो शवों को साफ कर के डिस्पोजेबल बैग में पैक करते हैं।

हाशमी ने कहा कि मैं एक मुस्लिम हूं और हिंदू श्मशान में मदद करता हूं। मृत्यु में सभी समान हैं। स्टाफ की कमी है। अंतिम संस्कार में कोविड रोगी का कोई भी पारिवारिक सदस्य नहीं हिस्सा ले पाता है। मैें उनकी मदद करता हूं।

इंडियन एक्सप्रेस के साथ बात करते हुए शंटी ने कहा कि लगभग 25 साल पहले, उन्होंने एक व्यक्ति को निगम बोध घाट पर देखा था कि वो जली हुई लकड़ी इकट्ठा कर रहा था। उस समय उन्हें लगा कि वो एक चोर है लेकिन बाद में उन्हें पता चला कि उनके पास अपने बेटे का दाह संस्कार करने के लिए लकड़ी खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। उस घटना ने उन्हें इस कार्य के लिए प्रेरित किया है।

उन्होंने कहा कि पिछले दस दिनों में मैंने कई भयावह दृश्यों को देखा है। मैंने ऐसी हालत कभी नहीं देखी थी। मैंने छोटी लड़कियों को अपने पिता के शरीर को ले जाते देखा है। मैंने देखा है कि परिवार अपने मृत रिश्तेदारों के साथ घंटों तक घर में फंसे रहते हैं, लोग उनकी कारों में आते हैं और एक शब्द कहे बिना स्ट्रेचर पर शवों को गिरा देते हैं।