कोरोना: चिकित्सकों के लिए आसान नहीं होता दम तोड़ते मरीज के लिए कुछ भी न कर पाने का सदमा

कोलकाता के चेस्ट स्पेशलिस्ट डॉ अनिर्बान बिश्वास ने गत दिवस फेसबुक पर लाइव आकर कोविड को लेकर डॉक्टरों और अन्य चिकित्सा कर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य पर देर तक चर्चा की। उन्होंने कहा कि बंगाल ही नहीं पूरे देश में चिकित्सक और अन्य मेडिकल कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।

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कोविड-19 के कारण डॉक्टरों ने जो पीड़ा और संत्रास भोगा है, वह शायद किसी ने नहीं। कभी देखा है गंभीर मरीज को बचाते डॉक्टरों की टीम
को काम करते? हाथों और दिमाग की फुर्ती के साथ पूरी टीम का कोऑर्डिनेशन दूसरी किसी जगह न मिलेगा। कई बार डॉक्टर मरीज को नहीं बचा पाते। लेकिन एक संतोष रहता है कि कोशिश तो पूरी कर ली।

लेकिन, कोविड का मरीज का दम जब ऑक्सीजन की कमी से घुट रहा होता है तो डॉक्टर पर इस असहाय हालत का क्या असर पड़ता होगा। पिछले दिनों इस तरह के कई वीडियो सोशल मीडिया पर आए जिसमें चिकित्सक बात करते-करते रोने लगते हैं। मुंबई की महामारी विशेषज्ञ डॉ तृप्ति गिलाडा का वीडियो तो बहुत ही मर्मभेदी था। यह वीडियो डॉक्टर ने खुद बनाया था। मकसद था आम जन को कोरोना और कोविड की जानकारी देना। लेकिन अस्पतालों की हालत बयान करते-करते यह चिकित्सक जब ऑक्सीजन की कमी से मरते मरीजों की बात कहने लगीं तो अपनी असहाय हालत को याद करके सुबकने लगीं। बाद में उन्होंने फिर कहा भी कोविड के कारण कई डॉक्टर मेंटल ब्रेक डाउन का शिकार हो रहे हैं।

कोलकाता के चेस्ट स्पेशलिस्ट डॉ अनिर्बान बिश्वास ने गत दिवस फेसबुक पर लाइव आकर कोविड को लेकर डॉक्टरों और अन्य चिकित्सा कर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य पर देर तक चर्चा की। उन्होंने कहा कि बंगाल ही नहीं पूरे देश में चिकित्सक और अन्य मेडिकल कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।

उन्होंने कहा कि इस तरफ तुरंत ध्यान दिए जाने की जरूरत है। कोविड की भयावहता के बारे में चर्चा करते-करते डॉ बिश्वास सबको कोरोना से बचने के लिए क्या करना है और क्या नहीं करना है आदि शिक्षा देते रहे। फिर बात करते करते उनके अंदर कुछ टूट सा गया,  और वे सुबकने लगे। डॉक्टर के फेसबुक लाइव का उनके श्रोताओं पर अच्छा असर पड़ा। उन्होंने कमेंट सेक्शन पर जाकर उनको धन्यवाद दिया। वादा भी किया कि उनकी बात मानते हुए वे कोरोना के प्रोटोकॉल का पूरी तरह से पालन करेंगे।

उल्लेखनीय है कि जिन असहाय स्थितियों से डॉक्टरों को गुजरना पड़ रहा है, ठीक उन्हीं हालात से नर्सों और दूसरे स्वास्थ्य कर्मियों को भी दो-चार होना पड़ता है। उनको भी अपने सामने दम तोड़ते मरीज देखने पड़ते हैं। नतीजतन, उनके दिमाग पर भी असर पड़ता है। लेकिन फिलहाल कोविड खुद इतनी बड़ी मुसीबत है कि उससे इतर न तो सरकार सोच पा रही है न कोई और। डॉक्टर भी फिलहाल अपना दर्द बयान भर कर सकते हैं।