‘गुजरात में पाइपलाइन से बहता है मुस्लिमों का खून’, मोदी पर कभी ये बयान दे घिरे थे सरमा, फिर कैसे बने BJP के अजीज? जानें

छह साल पहले कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए हेमंत बिस्व सरमा पार्टी को इन चुनावों में जीत दिलाने के बाद आखिरकार मुख्यमंत्री चुने गए हैं।

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पूर्वोत्तर में एक के बाद एक कई अहम राज्यों में भाजपा का प्रभाव कायम करने वाले नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (NEDA) के संयोजक हिमंत बिस्व सरमा आखिरकार अपने गृह राज्य असम के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। रविवार को बैठक में सरमा को विधायक दल का नेता चुन लिया गया। इसी के साथ उनके मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया। हालांकि, भाजपा में एक बड़े नेता के तौर पर उभरने और केंद्रीय नेतृत्व की आंख का तारा बनने से पहल एक समय ऐसा भी था, जब सरमा मोदी और उनके साथियों को फूटी आंख नहीं भाते थे। यहां तक कुछ साल पहले भाजपा नेताओं ने उन्हें सबक सिखाने तक की बात कह दी थी।

कौन हैं हेमंत बिस्व सरमा?: हेमंत बिस्व सरमा ने छात्र राजनीति की शुरुआत असम स्टूडेंट्स यूनियन से की। बांग्लादेशियों के खिलाफ जब असम में आंदोलन चल रहा था, तब सरमा इन प्रदर्शनों का चेहरा बनकर उभरे थे। आसू के साथ लंबे समय तक रहने के बाद सरमा कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया के संपर्क में आए थे। कहा जाता है कि सक्रिय राजनीति में सरमा की एंट्री के पीछे सैकिया ही थे। बाद में उन्हें 1991 में कांग्रेस में अहम पद सौंपा गया।

सैकिया से अपनी करीबी और संगठन के लिए की गई मेहनत के चलते सरमा ने जल्द ही कांग्रेस में अपनी पहचान बना ली। इसका फायदा उन्हें 1996 के विधानसभा चुनाव में मिला, जब पार्टी ने उन्हें जालुकबाड़ी सीट से असम आंदोलन के बड़े नेता भृगु फुकन के खिलाफ मैदान में उतारा। हालांकि, पहले मौके पर सरमा को जीत नहीं मिली थी।

हालांकि, इस हार के बावजूद सरमा की ताकत में जरा भी कमी नहीं आई। 2001 में उन्हें एक बार फिर इसी सीट से टिकट दिया गया और सरमा ने फुकन को परास्त कर दिया। तब से लेकर अब तक सरमा इस सीट से लगातार विधायक बनते आ रहे हैं। यह पांचवी बार है, जब उन्हें इस सीट पर जीत मिली है।

तरुण गोगोई ने दिए अहम पद, पर गौरव गोगोई के प्रभाव से हुए खफा: बताया जाता है कि हेमंत बिस्व सरमा शुरुआत से ही महत्वाकांक्षी नेता रहे हैं। 2001 में तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली सरकार में उन्हें मंत्री पद दिया गया। सरमा को शुरुआत में कृषि और योजना एवं विकास विभाग का राज्यमंत्री बनाया गया, लेकिन बाद में उन्हें वित्त, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बड़े विभाग भी मिले। कांग्रेस के आला नेता मानने लगे थे सरमा पार्टी को नंबर दो नेता हैं और गोगोई के हटने के बाद वे ही असम का मुख्यमंत्री चेहरा होंगे।

2011 में हेमंत बिस्व सरमा को विधानसभा चुनाव में इंचार्ज बनाया गया और उन्होंने बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए पार्टी को 126 में से 78 सीटों पर जीत भी दिलाई। हालांकि, कांग्रेस को मिली जीत के बाद गोगोई ने तीसरी बार सीएम पद की शपथ ली और अपने राजनीतिक वारिस के तौर पर अपने बेटे गौरव गोगोई को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। कहा जाता है कि गोगोई परिवार से इसके बाद ही सरमा की दूरी बननी शुरू हो गई थी।

बताया जाता है कि सीएम गोगोई शुरुआती दोनों कार्यकाल में सरमा पर आंख मूंदकर भरोसा करते थे, लेकिन तीसरे कार्यकाल में उन्हें नजरअंदाज करने लगे। गोगोई के इस व्यवहार से नाखुश होकर सरमा ने 2013-14 के बीच कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व से मुलाकात की। इनमें राहुल गांधी और सोनिया गांधी भी शामिल रहे। लेकिन उनकी मांगों को अनसुना कर दिया गया। इधर तरुण गोगोई ने सरमा से पूरी तरह दूरी बना ली। इसी बीच हिमंत बिस्व सरमा ने 2014 में भाजपा के तत्कालीन प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पर वह बयान दिया था, जिसकी वजह से भाजपा उनसे खासी नाराज हो गई थी।

क्या बोले थे सरमा?: हेमंत बिस्व सरमा ने 29 मार्च 2014 को असम के तेजपुर स्थित पंच माइल में चुनावी रैली को संबोधित किया था। इसमें उन्होंने मोदी पर निशाना साधते हुए कहा, “आप (नरेंद्र मोदी) ने कहा था कि गुजरात में पानी के पाइप के अंदर मारुति कार चल सकती है। हां, आप यह सच बताइए असम के लोगों को कि असम में पानी के पाइप के अंदर से पानी बहता है। गुजरात के पानी के पाइपों से मुसलमानों का खून बहता है।”

सरमा का यह बयान था और भाजपा नेतृत्व में उन्हें लेकर गुस्सा पनप उठा। दरअसल, सरमा उस वक्त भी कांग्रेस के बड़े नेता और मंत्री थे। उनके इस बयान पर भाजपा नेताओं ने केंद्र में सरकार बनने के बाद उन पर भ्रष्टाचार मामलों की जांच तक की धमकी दे डाली थी।

कैसे भाजपा के करीब आए हेमंत बिस्व सरमा?: 2014 के लोकसभा चुनावों को सरमा के करियर का बड़ा टर्निंग पॉइंट माना जाता है। दरअसल, इन चुनावों में भाजपा की जबरदस्त जीत हुई थी। असम भी मोदी की लहर से बच नहीं पाया और पार्टी को यहां 14 लोकसभा सीटों में से 7 पर जीत मिली। वहीं, कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल की AIUDF 3-3 सीटें हासिल कर पाई थी। एक सीट निर्दलीय के खाते में गई थी। इन नतीजों के बाद सरमा कांग्रेस में और अलग-थलग पड़ गए। यहीं से उन्होंने भाजपा की तरफ जाने का मन बना लिया था।

‘राहुल को बताया था कांग्रेस 25 सीटों पर सिमटेगी, पर वे नहीं माने बात’: द इंडियन एक्सप्रेस’ को 2016 में दिए एक इंटरव्यू में हेमंत ने बताया था कि वे एक साल पहले यानी कांग्रेस छोड़ने से पहले जुलाई 2015 में राहुल गांधी से मिले थे। उन्होंने बताया, “मैंने उन (राहुल गांधी) से कहा था कि कांग्रेस 25 सीटों से आगे नहीं निकल पाएगी। आज नतीजा आपके सामने है।” उनके मुताबिक, “मैंने राहुल से कहा- आप बुरी तरह हारेंगे। वे बोले- नहीं, हम जीतेंगे। मैंने कहा- देख लीजिएगा।”

शाह से मिलने के बाद थामा भाजपा का दामन: हेमंत बताते हैं, “सच ये है कि कई बार मुझे राहुल से मिलने नहीं दिया गया। मैंने राहुल से 8-9 बार बात करने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने मेरी बात सुनने से ज्यादा अपने कुत्तों के साथ खेलना बेहतर समझा। अपने आसपास मौजूद लोगों की बात सुनने से ज्यादा वे कुत्तों के साथ खेलने में बिजी रहते हैं।” वे बताते हैं, “जब मैं अमित शाह से मिला तो राहुल ने एक सीरियस मैसेज भेजा। मैंने उन्हें रिप्लाई किया- अब आपका समय खत्म हुआ।”

2016 के चुनाव में दिलाई भाजपा को बड़ी जीत और बन गए हीरो: 28 अगस्त 2015 को हिमंत बिस्व सरमा कांग्रेस का साथ छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए। उनके साथ सात और विधायकों ने भाजपा का साथ थामा। सरमा के मोदी लहर के साथ शामिल होने का असर यह हुआ कि 2011 में असम में पांच विधायक वाली भाजपा ने 2016 में 60 सीटों पर जीत दर्ज कर ली। भाजपा गठबंधन को 86 सीटों पर जीत मिली थी। इसके बाद सरमा को भाजपा में भी नंबर-दो की हैसियत मिली और सर्वानंद सोनोवाल राज्य के सीएम बने। पर अगले पांच साल की मेहनत के बाद आखिरकार सरमा मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने में कामयाब हो गए हैं।