‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के बाद भी काम नहीं था, कोई नहीं पूछ रहा था- KBC 13 में पंकज त्रिपाठी ने किया खुलासा

KBC में पंकज त्रिपाठी ने बताया कि ‘गैंग्स के वासेपुर’ के 6 महीनों बाद उनके पास काम की किल्लत होने लगी थी, उन्हें कहीं कोई पूछता नहीं था।

pankaj tripathi, amitabh bachchan, kaun banega crorepati पंकज त्रिपाठी ने अमिताभ बच्चन के सामने अपने संघर्षों को याद किया (Photo-YouTube)

Kaun Banega Crorepati: अमिताभ बच्चन द्वारा होस्ट किए जाने वाले शो के सेलेब्रिटी स्पेशल एपिसोड में इस शुक्रवार अभिनेता पंकज त्रिपाठी और स्कैम 1992 फेम अभिनेता प्रतीक गांधी पहुंचे थे। केबीसी में पंकज त्रिपाठी ने खुलासा किया कि उनके करियर में पहले तो संघर्ष था ही, फिल्म ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ के हिट होने पर भी उनका संघर्ष ख़त्म नहीं हुआ था। हालांकि इस फिल्म से पंकज को काफी लोकप्रियता मिली थी। उन्होंने बताया कि इस फिल्म के 6 महीनों बाद उनके पास काम की किल्लत होने लगी थी, उन्हें कहीं कोई पूछता नहीं था।

दरअसल अमिताभ बच्चन ने पंकज त्रिपाठी से सवाल किया था, ‘आपके जीवन में कौन सा ऐसा समय आया जब आपको लगा कि ये हमारे कलाकार जीवन का टर्निंग पॉइंट है?’ उनके इस सवाल पर पंकज त्रिपाठी ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘मुझे जब लगता था हो गया,उसके चार महीने बाद फिर लगता था कि कुछ नहीं हुआ। ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ के बाद लोग पहचानने लगे थे…बातें होने लगी थीं। कुछ लोगों ने मेसेज किया, कुछ लोग मिले, अख़बार में थोड़ा बहुत लिखा गया। मुझे लगा हो गया लेकिन उसके 6 महीने बाद वापस कोई काम नहीं…कहीं कोई नहीं पूछ रहा है।’

पंकज त्रिपाठी ने आगे कहा, ‘न्यूटन के बाद कभी रुकने का मौका नहीं मिला। इस फिल्म के बाद मैं लगातार व्यस्त ही रहा हूं। तो न्यूटन के बाद कह सकते हैं।’

पंकज त्रिपाठी ने इसी दौरान बताया कि वो बिहार के जिस गांव से आते हैं, वहां उनके बचपन के दिनों में सबके घर माचिस तक नहीं होता था। उन्होंने बताया, ’90 के दशक की बात है, मेरा इलाका इतना पिछड़ा था कि माचिस हर घर में नहीं होता था। शाम को चूल्हा जलाने के लिए होता था कि उस आदमी के दरवाजे पर आग जली है। वहां से आग लेकर आए, अपने यहां दे दी तो चूल्हा जल रहा है।’

पंकज त्रिपाठी ने बताया कि उनके घर से 8 किलोमीटर की दूरी पर एक रेलवे स्टेशन है ‘रतन सराय।’ उस ज़माने में दिन में केवल शाम 8 बजे एक ट्रेन गुजरती थी जिसका हॉर्न भी वहां नहीं बजता था। लेकिन उस ट्रेन के इंजन की आवाज़ गांव तक स्पष्ट आती थी। लोग उस ट्रेन के आवाज़ को ही अपने रात का अलार्म मानते थे और सोने चले जाते थे।