चुनावी चैलेंजः BJP का सीट शेयर बंगाल से तमिलनाडु तक में सबसे कम, केरल समेत 3 सूबे भी कांग्रेस के लिए बेहद अहम

चुनावी समीकरणों पर नजर डालें तो साफ दिखता है कि बीजेपी, कांग्रेस के साथ टीएमसी और डीएमके के लिए यह चुनाव खासे अहम हैं। केरल में वाम दलों के लिए यह चुनाव जीने मरने का सवाल बन गया है।

MODI & RAHUL

चुनाव आयोग ने पांच सूबों में चुनाव के लिए प्रोग्राम का ऐलान किया तो आधिकारिक तौर पर भी रणभेरी बज गईं। अब सभी की निगाह 2 मई पर टिकी है, क्योंकि इस दिन चुनाव परिणाम सामने आएंगे और पता चलेगा कि किसने कहां बाजी मारी। चुनावी समीकरणों पर नजर डालें तो साफ दिखता है कि बीजेपी, कांग्रेस के साथ टीएमसी और डीएमके के लिए चुनाव खासे अहम हैं तो केरल में वाम दलों के लिए यह चुनाव जीने मरने का सवाल बन गया है।

बीजेपी का लक्ष्य है बंगाल, तमिलनाडु की सत्ता

BJP की बात करें तो उसका सीट शेयर बंगाल से तमिलनाडु तक में सबसे कम है। 2014 के बाद से बीजेपी ने कई सूबों में जीत हासिल की है, लेकिन उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती देश का पूर्वी छोर है। बंगाल और तमिलनाडु में उसे कभी जीत हासिल नहीं हुई। बंगाल में उसकी उम्मीद 2019 लोकसभा चुनाव के परिणाम हैं। इनमें उसे 40% वोट हासिल हुए थे। तमिलनाडु में वह दिवंगत जयललिता की सत्तारूढ़ पार्टी AIADMK के साथ गठबंधन करके जोर आजमाइश कर रही है। बीजेपी की कोशिश है कि वह पूर्वी किनारे पर मौजूद राज्यों में अपनी पताका फहरा सके। बंगाल में बीजेपी की उम्मीद 2019 के लोकसभा परिणाम हैं। तब उसे इस सूबे से 18 सीटों पर जीत हासिल हुई थी।

कांग्रेस के लिए केरल, तमिलनाडु और असम बेहद अहम

कांग्रेस की बात करें तो उसके लिए केरल, तमिलनाडु और असम का चुनाव खासा अहम है। इन राज्यों से लोकसभा की कुल सीटों 543 में से 13% सीटें आती हैं। कांग्रेस की बात की जाए तो पिछले चुनाव में उसे मिलीं 52 सीटों में से 50% इन राज्यों से आती हैं। तमिलनाडु की बात करें तो यहां कांग्रेस DMK की जूनियर पार्टनर के तौर पर चुनाव लड़ रही है। केरल में वह UDF को लीड कर रही है तो असम में उसने AIUDF से हाथ मिलाया है। यहां कांग्रेस ने रिस्क भी लिया है, क्योंकि AIUDF को मुस्लिम समर्थक दल माना जाता है और इससे गैर मुस्लिम वोटर नाराज भी हो सकता है। वैसे कांग्रेस और AIUDF के वोट शेयर को देखा जाए तो साफ है कि गठबंधन के तौर पर दोनों दल सत्ता हासिल करने के करीब हैं।

असेंबली चुनाव तय करेंगे ममता और स्टालिन का कद

2014 के बाद के सीन को देखा जाए तो तमिलनाडु और बंगाल बीजेपी के लिए सबसे बड़ी परेशानी बनकर सामने आए हैं। कांग्रेस के बाद स्टालिन की DMK और ममता की TMC लोकसभा में बीजेपी का सबसे ज्यादा विरोध करती रही है। हालांकि, 2019 के चुनाव में ममता की पार्टी की लोकसभा में सीटें 34 से घटकर 22 तक जा पहुंची, लेकिन DMK ने 39 में से 38 सीटें जीतकर हड़कंप मचा दिया था। मौजूदा विधानसभा चुनाव दोनों पार्टियों के लिए अहम हैं, क्योंकि इनके परिणाम के जरिए दोनों दलों की राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका तय होगी।

केरल गया तो वाम दल हो जाएंगे खत्म

केरल की बात की जाए तो ये चुनाव वाम दलों के लिए जीवन मरण का प्रश्न है। 1980 के बाद की बात की जाए तो केरल की सत्ता LDF(लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट) और UDF (यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) के बीच तब्दील होती रही है। LDF को सबसे बड़ा झटका 2019 के लोकसभा चुनाव में लगा। तब पार्टी 20 में से केवल एक लोकसभा सीट ही जीत सकी थी। हालांकि लोकल बॉडी चुनाव में वाम दलों ने बेहतरीन प्रदर्शन करके एक उम्मीद जगाई। भारतीय राजनीति में वाम दलों के दखल की बात की जाए तो बंगाल, केरल और त्रिपुरा पर उनका खासा असर देखने को मिला। अलबत्ता, आज के दौर में बंगाल में वाम दल अंतिम सांसें गिन रहे हैं तो त्रिपुरा में भी उनकी हालत पतली है। उनकी एकमात्र उम्मीद अब केरल से है।