जंगल बचाओ

इसी नाम से बहुत पहले एक फिल्म आ चुकी है जिसमें राजेश खन्ना हीरो थे। नई फिल्म में राणा डग्गुबाती केंद्र में हैं।

इसी नाम से बहुत पहले एक फिल्म आ चुकी है जिसमें राजेश खन्ना हीरो थे। नई फिल्म में राणा डग्गुबाती केंद्र में हैं। कह सकते हैं वे इसके हीरो हैं। लेकिन क्या नई फिल्म धमाल मचा पाएगी? संदेह है। इसलिए नहीं कि राणा डग्गुबाती में दम नहीं है। इसलिए कि पूरी फिल्म एक अच्छे उद्देश्य से प्रेरित होने के बावजूद पटकथा के स्तर पर कमजोर है।

‘हाथी मेरे साथी’ पर्यावरण पर केंद्रित है। यानी जंगल कैसे बचाए जाए, वन प्राणी कैसे बचाए जाए- इस धारणा पर आधारित है। राणा डग्गुबाती ने इसमें वनदेव नाम के शख्स का किरदार निभाया है जो जंगल से, वहां रहने वाले प्राणियों से, खासकर हाथियों से बहुत प्यार करता है। वो जंगल में ही रहता है। लेकिन आजकल ‘विकास’ नाम चीज का चलन है जो अपनी सोच में अब धीरे-धीरे विनाश की पर्याय बनती जा रही है। जिस जंगल में वनदेव का निवास है उस पर एक बिल्डर (अनंत महादेवन) की नजर है और वो वहां एक टाउनशिप बसाना चाहता है। जाहिर है वनदेव और बिल्डर की टक्कर होती है। श्रिया पिलगांवकर ने एक पत्रकार की भूमिका निभाई है और जोया हसन एक एक्टिविस्ट बनी हैं।

आजकल ऐसे एक्टिविस्ट को नक्सल कहे जाने का चलन चल पड़ा है। ऐसा इस एक्टिविस्ट के साथ भी होता है। फिल्म देखते हुए दर्शकों को इसी की उत्सुकता रहती है कि वनदेव सफल होगा या बिल्डर? लेकिन फिल्म किसी तरह का रोमांच पैदा नहीं कर पाती क्योंकि संपादन का पक्ष भी शिथिल है। हालांकि राणा ने अपनी तरह से कोशिश की है लेकिन फिल्म को चुस्त रूप में पेश करने में वे भी सफल नहीं हो सके।

इसी मसले पर कुछ महीने पहले एक फिल्म आई थी शेरनी, जिसमें विद्या बालन ने एक ऐसी वन अधिकारी की भूमिका निभाई थी जो एक शेरनी को बचाने की कोशिश करती है। उसमें भी कुछ-कुछ ढीलापन था फिर भी उसकी बात दर्शकों तक पहुंच गई थी। ‘हाथी मेरे साथी’ के साथ ये भी मुश्किल है कि ये बहुत लंबी, लगभग पौने तीन घंटे की है और इतनी लंबी होने की वजह से भी प्रवचनात्मक होकर रह गई है। ये ‘जी’ के ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आई हुई है और तमिल और तेलगु में पहले ही रिलीज हो गई थी।