जब चंबल के डाकुओं ने किया था विजयाराजे सिंधिया के काफिले पर हमला, हकीकत जानने के बाद मांगी थी माफी

राजमाता के जीवन का एक किस्सा बहुत रोचक है, जब उन्हें चंबल के डाकुओं ने घेर लिया था और उनके काफिले पर हमला कर दिया था। हालांकि बाद में इन डाकुओं ने उनसे माफी भी मांगी थी।

Vijayaraje Scindia उन्हें चंबल के डाकुओं ने घेर लिया था और उनके काफिले पर हमला कर दिया था। (फोटो सोर्स- Express Archive)

ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया के जीवन में कई परेशानियां आईं लेकिन वह हर बार बहादुरी से इनका सामना करती रहीं। उनके जीवन का एक किस्सा बहुत रोचक है, जब उन्हें चंबल के डाकुओं ने घेर लिया था और उनके काफिले पर हमला कर दिया था।

हालांकि जब इन डाकुओं को ये पता लगा कि इस काफिले में राजमाता सिंधिया हैं तो उन्होंने इसके लिए माफी भी मांगी थी। हुआ यूं था कि राजमाता रायबरेली में चुनाव प्रचार के लिए जा रही थीं, लेकिन जैसे ही वह ग्वालियर की सीमा से बाहर निकलीं, वैसे ही चंबल के डकैतों ने उन्हें घेर लिया और गोलियां चलना शुरू हो गईं।

गोली लगने से राजमाता की दूसरी कार के चालक जय सिंह की गाड़ी का शीशा टूट गया और वह घायल हो गए। हालांकि कुछ देर के बाद 5-6 लोग खाकी वर्दी में आए और कार चालक को आगे बढ़ने का इशारा किया।

इस घटना के अगले ही दिन डकैतों के मुखिया ने राजमाता की गाड़ी चला रहे चालक बाल आंग्ले को संदेश भेजा कि उन लोगों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि गाड़ी में राजमाता हैं, नहीं तो हम ऐसी भूल नहीं करते। हमें माफ कर दें।

इस किस्से का जिक्र ‘राजपथ से लोकपथ पर’ नाम की किताब में है। ये राजमाता विजयाराजे सिंधिया की ऑटोबायोग्राफी है और इसका संपादन मृदुला सिन्हा ने किया है।

राजमाता अपने जीवन में हर बार आने वाले संकट से लड़ती रहीं। उनके इसी स्वभाव की वजह से जनता उन्हें आज भी याद करती है।

जब देश में इंदिरा सरकार के समय इमरजेंसी लगी थी, तब वह दिल्ली की तिहाड़ जेल में भी रही थीं। एक महारानी का जीवन जीने वाली महिला के लिए जेल का जीवन जीना बेहद कठिन था, लेकिन अपने संकल्प के बल पर उन्होंने इस लड़ाई को भी जीता और जेल की सजा पूरी की।

जेल में उनकी पहचान कैदी नंबर 2265 थी। यहां उनकी मुलाकात जयपुर की राजमाता गायत्री देवी से भी हुई थी। सिंधिया ने ही उन्हें जेल में सकारात्मक बने रहने में मदद की थी, क्योंकि गायत्री जेल के जीवन से पूरी तरह टूट गई थीं।