जब संसद में हंगामे की बात करते हुए रो पड़ीं राज्यसभा सांसद, बोलीं- महिलाओं का अपमान

सदन के एक सीसीटीवी फुटेज में विपक्षी सांसदों को सदन के केंद्र में नारे लगाते हुए और संसद की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार मार्शलों को उन्हें रोकने की कोशिश करते हुए देखा जा सकता है।

congress, rajya sabha पत्रकारों से बातचीत करते हुए सांसद रो पड़ीं। (फोटो-एएनआई)।

कांग्रेस की राज्यसभा सांसद छाया वर्मा और फूलो देवी नेताम बुधवार को संसद में 11 अगस्त को हुए हंगामे पर मीडिया को संबोधित करते हुए रो पड़ीं। फूलो देवी नेताम ने कहा कि महिला सांसदों के साथ पुरुष मार्शलों ने बदसलूकी की, जो कि महिलाओं का अपमान है। मीडिया से बात करने के दौरान सांसदों की आंखों में आंसू आ गए।

मालूम हो कि 11 अगस्त को सदन में किसानों के मुद्दे पर चर्चा के दौरान विपक्षी सांसद एक मेज के ऊपर चढ़ गए थे और एक आधिकारिक फाइल कुर्सी पर फेंक दी थी। कुछ सांसदों को भी आगे की पंक्ति की सीटों पर बैठे हुए देखा गया, जिससे सदन को कई बार स्थगित करना पड़ा। सदन के एक सीसीटीवी फुटेज में विपक्षी सांसदों को सदन के केंद्र में नारे लगाते हुए और संसद की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार मार्शलों को उन्हें रोकने की कोशिश करते हुए देखा जा सकता है।

कई विपक्षी सदस्यों को भी कागज फाड़ते और उन्हें उछालते देखा गया, जबकि उनमें से एक टेबल पर चढ़ गये थे। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला दोनों ने विपक्ष के व्यवहार पर नाराजगी व्यक्त की। नायडू ने सदन में इस घटना को “अपवित्र” बताया।

टीएमसी के डेरेक ओ’ब्रायन ने कहा कि दोनों सदनों ने सामूहिक रूप से मानसून सत्र में 35 विधेयकों को पारित किया था। नायडू की टिप्पणी ने सांसदों की कड़ी प्रतिक्रिया को उकसाया। जिसके बाद सांसद वेल में आ गए और नारेबाजी करने लगे।

स्पीकर ओम बिरला ने कहा कि वह लोकसभा की “खराब उत्पादकता” से निराश हैं। सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने के बाद उन्होंने संवाददाताओं से कहा, “मैंने सदन को सुचारू रूप से चलाने और सभी सदस्यों को समान अवसर देने की पूरी कोशिश की, लेकिन सदन की उत्पादकता बहुत खराब थी।”

बता दें कि लोकसभा ने मानसून सत्र के दौरान 96 घंटे के निर्धारित समय के मुकाबले केवल 21 घंटे 14 मिनट काम किया। हालांकि, सदन ने 20 विधेयकों को पारित किया और 13 को पेश किया।

ओबीसी सूची तय करने के लिए राज्यों की शक्तियों को बहाल करने के लिए संशोधन पर एकमात्र बहस थी, जिसे दोनों सदनों द्वारा पारित किया गया था। अन्य कानूनों को बिना किसी चर्चा के मंजूरी दे दी गई।