जब 15 साल की उम्र में जेपी नारायण की कार पर चढ़कर जताया था विरोध, जानें- कैसे पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘दीदी का सिक्का’ जमा

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भवानीपुर सीट पर 58,000 से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत हासिल करके साबित कर दिया कि कोलकाता की कुर्सी पर दीदी का ही राज चलेगा।

Mamata Banerjee bhawanipur बंगाल उपचुनाव: भवानीपुर में ममता बनर्जी को मिली जीत । Photo- File/ Indian Express

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भवानीपुर सीट पर 58,000 से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत हासिल करके साबित कर दिया कि कोलकाता की कुर्सी पर दीदी का ही राज चलेगा। राजनीति की राहों में ममता बनर्जी को जब-जब चुनौतियां मिली, तब-तब वह उनसे अपने पार पाने में कामयाब रहीं। हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने TMC के किले में सेंधमारी की जोरदार कोशिश की लेकिन वह कामयाब न हो पाए। भवानीपुर में हुए उपचुनावों को भी बीजेपी ने अपने आक्रामक प्रचार अभियान से इसे ‘नाक का सवाल’ बना दिया था जिसमे ममता बनर्जी की ही जीत हुई, जीत के बाद सीएम बनर्जी ने अपने अंदाज में विरोधियों को जवाब देते हुए कहा, ‘नंदीग्राम में रची गई साजिश का भवानीपुर के लोगों ने मुंहतोड़ जवाब दिया।’

जेपी नारायण की कार पर चढ़ गई थीं ममता बनर्जी: ममता बनर्जी ने 15 साल की उम्र में राजनीति की दुनिया में प्रवेश कर लिया था। जोगामाया देवी कॉलेज से पढ़ाई के दौरान ममता ने छात्र संगठन बनाया था। 1970 के दशक में वह कांग्रेस के साथ जुड़ीं। साल 1975 में ममता बनर्जी पहली बार सुर्खियों में तब आईं जब वह समाजवादी कार्यकर्ता और राजनेता जयप्रकाश नारायण की कार पर चढ़ गईं थीं।

1975 में जेपी नारायण कोलकाता में एक विशालसभा को संबोधित करने वाले थे, शहर में जैसे ही उनका काफिला घुसा, कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने घेराबंदी शुरू कर दी, रास्ते रोके जाने लगे, नारेबाजी से पूरा शहर गूंज उठा। इसी दौरान ममता बनर्जी, एक युवा कार्यकर्ता के तौर पर भीड़ को चीरते हुए जेपी नारायण की कार के पास पहुंच गई। ममता बनर्जी ने एक पैर टायर पर रखा और उछलकर बोनट पर पहुंच गई। फिर क्या था, लोग ममता के सुर में सुर मिलाने लगे और अगले दिन जेपी नायारण के आंदोलन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की तस्वीरों में ममता बनर्जी ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींचा।

1984 में बनी सांसद: ममता बनर्जी, 1984 के लोकसभा चुनावों में युवा सांसद के तौर पर जानी जाने लगीं। उन्होंने जादवपुर सीट से कम्युनिस्ट नेता सोमनाथ चटर्जी को हराया था। हालांकि 1989 के चुनावों में CPI (M) की मालिनी भट्टाचार्य से हार गई थीं लेकिन इसके बाद वह और मजबूत बनकर उभरीं। उन्होंने 1991 के लोकसभा चुनाव में फिर जीत दर्ज की और फिर 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 के आम चुनावों में कोलकाता दक्षिण सीट से जीतती रहीं।

यहां से बदली राहें: ममता बनर्जी ने 1998 में पहली जनवरी को अपनी पार्टी का गठन किया और उसे तृणमूल कांग्रेस का नाम दिया। 2009 में हुए लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने UPA के साथ गठबंधन कर लिया, UPA जीता तो उन्हें रेलवे मंत्रालय जैसा अहम पद मिला। इसके बाद 2011 में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी और कांग्रेस के गठबंधन ने जीत हासिल की, जिसके बाद उन्होंने पश्चिम बंगाल की 8वीं मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। इसके बाद साल 2016 में लगातार दूसरी बार राज्य की मुख्यमंत्री बनीं, 2021 में जीत दर्द की लेकिन भवानीपुर सीट के उपचुनावों ने तनाव को बढ़ा दिया था, जोकि अब खत्म हो गया है।