जब IAS अधिकारियों पर बोले थे कुमार विश्वास, परेशान होते हैं तो पांचवें माले पर बैठ धान की कीमत तय करने लगते हैं

उन्होंने कहा कि अफसरों को आम आदमी बनना पड़ेगा। कहा कि लॉक डाउन में प्रवासी लोग सब कुछ गंवाकर और छोड़कर घरों की ओर जा रहे थे, जबकि गांव वाले अपने घरों में ही पड़े थे। गांव के लोग दूसरों की मदद के लिए खुद आगे आ जाते हैं, शहरों में ऐसा कम ही होता है।

देश के जाने माने कवि कुमार विश्वास। (Source: Twitter/@DrKumarVishwas)

देश के जाने-माने कवि और सामाजिक कार्यकर्ता कुमार विश्वास अपनी बेबाकी और खुलकर अपनी बातें रखने की वजह से लोगों के दिलों पर राज करते हैं। उनकी सभाओं और कार्यक्रमों में भारी भीड़ जुटती है। अभी हाल ही में न्यूज चैनल लल्लन टॉप के एडीटर सौरभ द्विवेदी से बात करते हुए कई मुद्दों पर अपनी राय रखी। देश में फैली कोरोना वायरस बीमारी और तमाम दूसरी समस्याओं की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि हमें अपनी जड़ों से जुड़ना होगा। जब तक हम गांव नहीं चलेंगे, तब तक परेशानियां और संकटों का हल नहीं खोज सकेंगे।

लल्लन टॉप पर सौरभ कुमार से बात करते हुए कुमार विश्वास ने कहा कि जो लोग आईएएस की तैयारी करते और और आईएएस बन जाते हैं, वे लोग अगर आम जनता के साथ बैठें और उनकी बातें सुनें तो उन्हें पता चलेगा कि असल में वे क्या जानते हैं और क्या होता है। बीमारी और संकट, खेती-किसानी की दिक्कतें शहरों और बड़े-बड़े ऑफिसों में नहीं हल होते हैं, उनके लिए आम लोगों की तरह बनना पड़ता है, तब उसका अहसास होता है। उन्होंने कहा कि आईएएस बनना गलत नहीं है। आईएएस बनकर लोग आफिस में बैठ जाते हैं, फिर किसी विधायक या जनप्रतिनिधि से विवाद हुआ तो परेशान होते हैं। जब परेशान होते हैं तो पंचम तल पर बैठकर धान की कीमत तय करने लगते हैं।

उन्होंने कहा कि अफसरों को आम आदमी बनना पड़ेगा। कहा कि लॉक डाउन में प्रवासी लोग सब कुछ गंवाकर और छोड़कर घरों की ओर जा रहे थे, जबकि गांव वाले अपने घरों में ही पड़े थे। गांव के लोग दूसरों की मदद के लिए खुद आगे आ जाते हैं, शहरों में ऐसा कम ही होता है।

कहा कि अफसर बनिए लेकिन आम जनता की बातों को समझने की भी कोशिश कीजिए। गांव बचाओ, देश बचाओ, गांव को समझो और गांव की समस्या समझो। तब पता चलेगा कि असल में दिक्कत कहां पर है।

उन्होंने प्रवासी भारतीयों पर एक कविता भी सुनाई- रात के तीन शहर की रोशन से छूटा हुआ टूटा हुआ, सड़क के रास्ते से गांव जा रहा है, बिना छत तीज, दिवाली, विवाह क्या रचाते, बिलखते बच्चों को वापस बुला रहा होता, रात के तीन बज रहे हैं और दीवाना में अपने सुख के कवच के मौन की सरशैया पर अनसुनी सिसकियों के बोझ तले रोता हुआ जाने क्यों जागता हूं, जब दुनिया सोती है मुझको कुछ आवाज सी आती है कि मुझसे कुछ दूर है वह भारत माता….।