‘जिद्दी’ सरकार और ‘अड़ियल’ विपक्ष

संसद का सत्र सुचारु रुप से नहीं चलने से विधायी कार्यों का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। दूसरे दलों की राय को अहमियत दिए बिना और चर्चा कराए बिना सरकार बिना बहस के कई अहम विधेयक मिनटों में पास करा रही थी। ऐसा लग रहा था, मानो विधेयक पास कराने की महज औपचारिकता पूरी की जा रही है।

Rajya Sabha, Parliament, India News नई दिल्ली में संसद के मॉनसून सत्र के दौरान राज्य सभा के भीतर का दृश्य। (फाइल फोटोः RSTV/PTI)

संसद का मॉनसून सत्र एक बार फिर हंगामे की भेंट चढ़ गया। यह अप्रत्याशित भी नहीं था, क्योंकि विपक्ष पहले से ही पेगासस जासूसी कांड, कृषि कानून आदि के मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी कर चुका था और वह इस मुद्दों पर पूरे सत्र के दौरान अड़ा भी रहा। विपक्ष का कहना था कि पेगासस फोन टेप जासूसी मामले की जांच या तो संयुक्त संसदीय टीम से या फिर सर्वोच्च न्यायालय के जज के द्वारा कराई जाए। साथ ही तीन नए कृषि कानूनों को खारिज कराने के लिए दिल्ली के विभिन्न बॉर्डरों पर महीनों से धरना दे रहे किसानों से बात करके आंदोलन को खत्म कराया जाए। लेकिन, ‘जिद्दी’ सरकार ने लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष की इस मांग पर बहस कराने से साफ इन्कार कर दिया।

वैसे, सरकार ने बिना बहस के ही कई बिलों को पास भी करा लिया। पिछले दिनों विपक्षी हंगामे के बीच संसद ने तीन किसान बिल पारित किए हैं जिसका देशभर के किसान भी उनका विरोध कर रहे हैं। खासकर पंजाब-हरियाणा के किसान इन बिलों का विरोध कर रहे हैं। किसानों को डर है कि नए कानूनों से सरकार उन्हें मिलने वाली न्यूनतम समर्थन मूल्य से वंचित कर देगी। इसके अलावा सरकारी एजेंसियां उनका उत्पाद नहीं खरीद सकेंगी, जबकि निजी निवेशकों और कॉरपोरेट घरानों की घुसपैठ बढ़ जाएगी। इससे किसानों की उपज का उचित दाम नहीं मिल सकेगा। संसद के मानसून सत्र खत्म हो चुका है, लेकिन दुर्भाग्य से इस दौरान सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच किसी भी मुद्दे पर चर्चा के लिए सहमति नहीं बन पाई। विपक्ष चर्चा की शुरुआत पेगासस जासूसी के मुद्दे पर करना चाहता था, जबकि सरकार इस मसले पर बातचीत के लिए तैयार ही नहीं है। विपक्षी दलों के नेता किसानों को समर्थन देने जंतर मंतर पहुंचे जिसमें किसानों के संसद में राहुल गांधी समेत कई विपक्षी दलों के नेता भी शामिल हुए।

पेगासस को इजराइल की साइबर सुरक्षा कंपनी एनएसओ ने तैयार किया है। यह एक सॉफ्टवेयर है जिसे कहीं से बैठकर किसी के फोन को हैक किया जा सकता है। यूज़र के एसएमएस मैसेज और ईमेल को पढ़ने, कॉल सुनने, स्क्रीनशॉट लेने, की-स्ट्रोक्स रिकॉर्ड करने और कॉन्टैक्ट्स व ब्राउज़र हिस्ट्री तक पहुंचने में सक्षम है। एक अन्य रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि एक हैकर फोन के माइक्रोफोन और कैमरे को हाईजैक कर सकता है, इसे रीयल-टाइम सर्विलांस डिवाइस में बदल सकता है।

यह भी ध्यान देना चाहिए कि पेगासस एक जटिल और महंगा मालवेयर है, जिसे विशेष रुचि के व्यक्तियों की जासूसी करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, इसलिए औसत यूज़र्स को इसका टारगेट होने का डर नहीं है। बांग्लादेश समेत कई देशों ने पेगासस स्पाईवेयर ख़रीदा है। इसे लेकर पहले भी विवाद हुए हैं। मेक्सिको से लेकर सऊदी अरब तक की सरकार ने इसके इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाए हैं। वॉट्सएप के स्वामित्व वाली कंपनी फ़ेसबुक समेत कई दूसरी कंपनियों ने इस पर मुकदमे भी किए हैं। केंद्रीय सूचना और प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने लोकसभा में ‘पेगासस’ रिपोर्ट को लेकर कहा कि फोन टैपिंग को लेकर देश में कड़े कानून मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि जासूसी कराने के आरोप गलत हैं और लीक डेटा रिपोर्ट में गुमराह करने वाले तथ्य हैं। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि 18 जुलाई को छपी रिपोर्ट भारतीय लोकतंत्र को बदनाम करता हुए प्रतीत होता है।

ज्ञात हो ​कि पेगासस फोन टेपिंग लिस्ट में केंद्रीय प्रौद्योगिकी मंत्री अश्वनी वैष्णव का भी नाम है। यह भी ज्ञात हो कि 18 जुलाई की बात बार—बार इसलिए की जा रही है, क्योंकि 19 जुलाई से संसद का मानसून सत्र शुरू हो रहा था। सत्तापक्ष का यह भी कहना है कि 18 जुलाई को इस प्रकरण को इसलिए प्रकाशित और प्रचारित किया गया, ताकि विपक्ष संसद को चलने में व्यवधान उत्पन्न कर सके। यह विपक्ष की एक साजिश थी। पिछले दिनों सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा गया है कि वह पेगासास मामले की जांच के लिए एक टीम शीघ्र गठित करके मामले की जांच कराएगी ।

किसान जिन तीन नए कृषि कानूनों को काला कानून कहते हैं, अब इसे भी जानते हैं कि आखिर इन्हें काला कानून क्यों कहते हैं और क्योंकि इसे सरकार जबरन लागू करना चाहती है। इस क़ानून में एक ऐसा इकोसिस्टम बनाने का प्रावधान है जहां किसानों और व्यापारियों को राज्य की एपीएमसी (एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमिटी) की रजिस्टर्ड मंडियों से बाहर फ़सल बेचने की आज़ादी होगी। इनमें किसानों की फ़सल को एक राज्य से दूसरे राज्य में बेरोकटोक बेचने को बढ़ावा दिया गया है।

बिल में मार्केटिंग और ट्रांसपोर्टेशन पर ख़र्च कम करने की बात कही गई है, ताकि किसानों को अच्छा दाम मिल सके। इसमें इलेक्ट्रानिक व्यापार के लिए एक सुविधाजनक ढांचा मुहैया कराने की भी बात कही गई है, जबकि किसानों का कहना है कि इससे राज्य को राजस्व का नुक़सान होगा, क्योंकि अगर किसान एपीएमसी मंडियों के बाहर फ़सल बेचेंगे तो वे ‘मंडी फ़ीस’ नहीं वसूल पाएंगे। कृषि व्यापार अगर मंडियों के बाहर चला गया तो ‘कमीशन एजेंटों’ का क्या होगा? इसके बाद धीरे-धीरे एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) के ज़रिये फ़सल ख़रीद बंद कर दी जाएगी। मंडियों में व्यापार बंद होने के बाद मंडी ढांचे के तरह बनी ई-नेम जैसी इलेक्ट्रानिक व्यापार प्रणाली का आख़िर क्या होगा?

संसद का सत्र सुचारु रुप से नहीं चलने से विधायी कार्यों का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। दूसरे दलों की राय को अहमियत दिए बिना और चर्चा कराए बिना सरकार बिना बहस के कई अहम विधेयक मिनटों में पास करा रही थी। ऐसा लग रहा था, मानो विधेयक पास कराने की महज औपचारिकता पूरी की जा रही है। जबकि, संसद को एक मिनट चलाने में करीब ढाई लाख रुपये खर्च होते हैं और इस हिसाब से जनता के करोड़ों रूपये मानसून की बारिश की तरह बह रहे थे। संसद के मानसून सत्र की शुरुआत के बाद यह तीसरा सप्ताह था जब संसद नहीं चल रहा सका था।

पेगासस मुद्दे को लेकर विपक्ष कड़े तेवर बनाए हुए था , जबकि सरकार अपने रुख पर अड़ी हुई थी। लगातार विपक्ष के हंगामे के कारण सदन के संचालन में बाधा पहुंच रही थी, लेकिन इस बीच विपक्ष के विरोध की परवाह किए बिना सरकार मिनटों में फटाफट कई अहम विधेयक पारित करा रही थी। 19 जुलाई से 13 अगस्त तक चले संसद का कोई भी दिन ऐसा नहीं गया, जब सदन में दिनभर गंभीर मुद्दों पर बहस हुई हो। चूंकि पेगासस का मामला अब सर्वोच्च न्यायालय के पास विचारार्थ है, इसलिए जो कुछ भी होगा, वहां से निर्णय होने के बाद ही होगा, लेकिन माननीय जस्टिस एनवी रमण ने फिलहाल सरकार के प्रति जो रुख दिखाया है उससे निश्चित रूप से अच्छे निर्णय के आसार नजर आ रहे हैं।

रही किसानों के तीन काले बिल को वापस लेने की बात तो इस पर तो निर्णय सरकार को ही लेना है। लेकिन, सरकार ने जिस प्रकार किसानों के लिए अनिर्णय की स्थिति बना दी है, उससे तो यही लगता है कि सरकार का निर्णय तो अब तक विपरीत ही रहा है। आगे यह देखना दिलचस्प होगा कि वह आंदोलनरत किसानों को धरनास्थल पर ही रहने को मजबूर करती है या खुशी—खुशी उन्हें वापस अपने घर जाने का पुरस्कार देती है!

Nishikant Thakur, Journalist, Jansatta Blogलेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं और यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं।