जैव-चिकित्सा आपदा प्रतिक्रिया क्षमता निर्माण पर मंथन

कोविड-19 महामारी के दौरान कई अनुभव मिले हैं, जो भविष्य में ऐसी चुनौतियों से लड़ने में मददगार हो सकते हैं।

प्रोफेसर (डॉ) बलराम भार्गव, सचिव, स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (डीएचआर), स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार और महानिदेशक, आईसीएमआर।

कोविड-19 महामारी के दौरान कई अनुभव मिले हैं, जो भविष्य में ऐसी चुनौतियों से लड़ने में मददगार हो सकते हैं। नई दिल्ली में में 24-27 नवंबर तक चलने वाली विश्व आपदा प्रबंधन कांग्रेस (डब्ल्यूसीडीएम) में कोविड-19 के अनुभवों पर आधारित लचीली बायोमेडिकल (जैव-चिकित्सा) आपदा प्रतिक्रिया एवं इससे संबंधित रणनीति के निर्माण पर मंथन किया जा रहा है। डब्ल्यूसीडीएम में भागीदार भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा बुधवार को जारी वक्तव्य में यह जानकारी प्रदान की गई है।

डब्ल्यूसीडीएम, आपदा जोखिम प्रबंधन पर चर्चा के लिए दुनिया भर के शोधकर्ताओं, नीति निर्माताओं और चिकित्सकों को एक मंच पर लाने की एक पहल है। आईसीएमआर को बायोमेडिकल अनुसंधान एवं इससे संबंधित रणनीतियों के निर्माण, समन्वय एवं उनके प्रसार के लिए भारत में शीर्ष निकाय के रूप में जाना जाता है। डब्ल्यूसीडीएम के पाँचवें संस्करण में आईसीएमआर नॉलेज पार्टनर के रूप में भागीदारी कर रहा है।

डब्ल्यूसीडीएम का उद्देश्य विशेष रूप से आपदाओं के प्रति अनुकूलन स्थापित करने एवं जोखिम कम करने से जुड़े प्रयासों को बढ़ावा और इससे संबंधित वैज्ञानिक तथा नीतिगत प्रयासों को प्रोत्साहन देना है। बुधवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा सम्मेलन का उद्घाटन किया गया है।

प्रोफेसर (डॉ) बलराम भार्गव, सचिव, स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (डीएचआर), स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार और महानिदेशक, आईसीएमआर ने कहा, “आईसीएमआर ने अपने संबद्ध संस्थानों के साथ जैव चिकित्सा आधारित ज्ञान को वर्तमान संस्थागत क्षमता के साथ जोड़कर देश में आपदा प्रबंधन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। भारत सरकार के समर्थन से, आईसीएमआर ने आपदा प्रतिक्रिया को तीव्र एवं किफायती बनाने और चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए नवीन इंजीनियरिंग और बहु-विषयक तकनीकी क्षमताओं को एक साथ लाने के अपने प्रयास पर ध्यान केंद्रित किया है।”

सम्मेलन में एक विशेष तकनीकी सत्र में लचीली जैव-चिकित्सा आपदा प्रतिक्रिया के निर्माण परक व्यापक विमर्श किया गया। इस दौरान, कोविड-19 प्रकोप से लड़ने और उसके प्रभाव को कम करने में आईसीएमआर के वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित योगदान पर केंद्रित एक प्रस्तुति दी गई। इस मौके पर, कोविड-19 वैक्सीन के विकास से लेकर इस महामारी की रोकथाम और इससे उबरने से संबंधित गतिविधियों की एक विस्तृत श्रृंखला पर ध्यान केंद्रित करते हुए विशेषज्ञों द्वारा चर्चा की गई है।

सम्मेलन में मौजूद विशेषज्ञों ने भविष्य में इस तरह के प्रकोपों से निपटने के लिए एक विभिन्न हितधारकों के परस्पर जुड़ाव की आवश्यकता पर जोर दिया है। बेसिक मेडिकल साइंसेज (बीएमएस), आईसीएमआर के प्रमुख डॉ नबेंदु शेखर चटर्जी ने कहा है कि “बढ़ते वैश्विक पार, परिवहन, शहरीकरण और बढ़ते वैश्विक तापमान को देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उभरते और उपचार-प्रतिरोधी रोगजनकों का प्रकोप राष्ट्रीय सीमाओं को लाँघकर आसानी से फैल सकता है। कई नये कारक और बार-बार उभरने वाले रोगों के प्रकोप से रोगजनकों के प्रति हमारी संवेदनशीलता बढ़ रही है।”

डॉ समीरन पांडा, हेड, डिवीजन ऑफ एपिडेमियोलॉजी ऐंड कम्युनिकेबल डिजीज, आईसीएमआर ने कहा, “सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी आपातकालीन तैयारियों और त्वरित प्रतिक्रिया के के लिए समुदाय और सहयोग महत्वपूर्ण हैं। वैश्विक सहयोग इस प्रक्रिया में नये ज्ञान को विकसित करने और बेहतर प्रथाओं पर जानकारी के प्रसार के अवसर प्रदान करके मददगार हो सकता है।” उन्होंने कहा, कोविड-19 महामारी ने इस तरह की नेटवर्किंग और इनोवेशन के महत्व को रेखांकित किया है।

भारत में जैविक आपदाओं के प्रबंधन पर अनुसंधान के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) द्वारा आईसीएमआर को नोडल एजेंसी के रूप में मान्यता प्रदान की गई है। आईसीएमआर और इसके संस्थान देश की स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और सुरक्षा जोखिमों को कम करने एवं स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के व्यावहारिक समाधान खोजने के लिए भी प्रतिबद्ध हैं। 

(इंडिया साइंस वायर)