नासा ने खोजे पांच जुड़वां ‘सूरज’

अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉई के वैज्ञानिकों ने केपलर टेलिस्कोप के डेटा का विश्लेषण कर महाकाश में जीवन की संभावना का पता लगाया है। वैज्ञानिकों को पांच जुड़वां सितारों की ग्रह प्रणाली मिली है, जिसमें धरती जैसा सितारा है और एक छोटा सितारा भी। यह धरती से 3970 प्रकाशवर्ष दूर है। वहां बड़े सितारे का चक्कर लगाता हुआ वरुण के आकार का एक ग्रह भी मिला है। इसमें वैज्ञानिकों को जीवन की संभावना दिखी है।

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अमेरिकी अंतरिक्ष एजंसी नासा के केपलर स्पेस टेलिस्कोप से मिले आंकड़ों की मदद से वैज्ञानिकों की टीम ने एक अहम खोज की है। उन्हें पांच जुड़वां सितारों की प्रणाली मिली है और खास बात यह है कि हर किसी में एक ग्रह ऐसा है, जहां जीवन की संभावना नजर आती है। यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉई के वैज्ञानिकों ने केपलर डेटा का इस्तेमाल कर अंतरिक्ष में जीवन की संभावना का पता लगाया है।
वैज्ञानिकों की टीम ने दोनों सितारों के द्रव्यमान, उनकी चमक और सिस्टम के हिसाब से ग्रहों की स्थिति के आधार पर तय किया कि इनके ग्रहों पर जीवन कितना मुमकिन है। यहां यह देखा गया कि कहां पानी की कितनी संभावना है। इस ग्रह प्रणाली में एक धरती जैसा सितारा है और एक छोटा सितारा भी। यह धरती से 3970 प्रकाशवर्ष दूर है। वहां बड़े सितारे का चक्कर लगाता हुआ वरुण के आकार का एक ग्रह भी मिला है।

शोधकर्ताओं ने अंतरिक्ष में मिली नौ प्रणालियों के सितारों और ग्रहों के रहने लायक क्षेत्रों पर होने वाले असर का अध्ययन किया है। इनमें से जिस प्रणाली को उन्होंने चुना, उनमें एक वरुण के आकार का ग्रह है। इसके लिए केप्लर 34, 35, 38, 64 और 413 को चुना गया। इनमें से 38 के धरती जैसा होने की संभावना मानी गई है। इसके एक सितारे का द्रव्यमान सूरज का 95 फीसद है और छोटे सितारे का द्रव्यमान सूरज का 25 फीसद है। अभी तक एक ग्रह को इसका चक्कर काटते देखा गया है, लेकिन उम्मीद है कि ऐसे और भी ग्रह होंगे। ज्यादा सितारे से क्या फर्क? इन सभी प्रणालियों में ऐसा जीवन लायक क्षेत्र है, जहां सितारों के गुरुत्वाकर्षण का नकारात्मक असर नहीं होगा। यहां चट्टानी ग्रहों पर जीवन की संभावना है। सूरज के इर्द-गिर्द धरती की कक्षा अंडाकार है, जिससे हमें विकिरण लगभग एक समान मिलता है। यह स्थिति ऐसे ग्रहों के लिए नहीं है, जहां दो सूरज हों। यहां दोनों से विकिरण और गुरुत्वाकर्षण का असर पड़ता है।

460 करोड़ साल पुराने उल्कापिंड में पानी
पांच जुड़वां सूरज के साथ ही अंतरिक्ष की एक और हकीकत पता चली है। पृथ्वी पर पाए गए 460 करोड़ साल पुराने उल्कापिंड में पानी के अंश पाए गए हैं। ये जब चट्टान बने थे, तब उल्कापिंड के भीतर जमा हुआ पानी और कार्बन डायऑक्साइड रहे होंगे। इसका मतलब उल्कापिंड ऐसी जगह पर बना होगा, जहां तापमान ऐसा रहा हो कि पानी और कार्बन डायऑक्साइड जम गए।

धरती के बाहर चांद से लेकर मंगल तक पर पानी या बर्फ खोजी जा चुकी है। इनके अलावा ठोस खनिजों के भीतर भी पानी के कण मिले हैं, जिनसे इतिहास में पानी की मौजूदगी के संकेत मिलते हैं। इसी तरह एक उल्कापिंड में नमक के क्रिस्टल में वैज्ञानिकों को पानी मिला है। कभी किसी ऐस्टरॉयड का हिस्सा रहे उल्कापिंड के धरती पर गिरने के बाद वैज्ञानिकों ने इसके टुकड़ों पर अध्ययन किया और पाया कि इस उल्कापिंड में जो नमक मिला है, वह भी कहीं और से आया था।

जापान की रित्सुमीकान यूनिवर्सिटी में विजिटिंग रिसर्च प्रोफेसर डॉ. अकीरा सुचियामा और उनके साथियों ने 460 करोड़ साल पुराने उल्कापिंड के टुकड़े पर अध्ययन किया। शोधकर्ताओं को एक कैल्साइट क्रिस्टम मिला, जिसमें बहुत कम मात्रा में तरल मौजूद थी और 15 फीसद कार्बन डायऑक्साइड। इससे पुष्टि होती है कि प्राचीन पिंड में कैल्साइट क्रिस्टल के अंदर पानी और कार्बन डायऑक्साइड दोनों हो सकते हैं।