न वह बेहद ग़रीब थी और न ही असहाय। फिर यह निर्वासन वह क्यों झेल रही थी?

पत्रकार से नेता और क्र‍िकेट प्रशासक बने राजीव शुक्‍ला ने हाल ही में एक क‍िताब ल‍िखी है। नाम है ‘तीन समंदर पार’। इसे राजकमल प्रकाशन ने प्रकाश‍ित क‍िया है।प्रकाशक की अनुमत‍ि से यहां कि‍ताब का एक अंश द‍िया जा रहा है।

Rajiv Shukla, Novel, Book, Voyage Journey पत्रकार से नेता और क्र‍िकेट प्रशासक बने राजीव शुक्‍ला (बाएं) और उनके पहले उपन्यास तीन समंदर पार का आवरण पृष्ठ (दाएं)।

जहाज़ के ओपन-डेक पर उस शाम अपेक्षाकृत ज़्यादा भीड़ थी लेकिन वह बहुत देर से एक कोने में खड़ी सुर्ख लाल सूरज को ताक रही थी। क्षितिज में समाने से पहले डूबते सूरज की लालिमा नीले आसमान में घुलकर सम्मोहक दृश्य बना रही थी। इसीलिए वह और उसके आसपास रेलिंग पर लदे लोग सूर्यास्त का वह अद्भुत नज़ारा देखने से ख़ुद को रोक नहीं पा रहे थे लेकिन वह उनमें सबसे अलग नज़र आ रही थी क्योंकि सूरज की लालिमा उसकी आँखों की नमी में रक्तिम आभा बिखेर रही थी और उसके ख़ूबसूरत बाल भीतर उमड़ रही दुख की परछाइयों से अनजान थे। वे बार-बार हवा के प्रवाह में उड़कर उसके चेहरे पर आते और गालों पर अठखेलियाँ करने लग जाते। मैं भी बहुत देर से वहीं खड़ा हूँ, वह इस बात से भी अनजान थी।

पानी को चीरता हुआ नब्बे हज़ार टन वजन का विशालकाय जहाज़ तीर की तरह तट से दूर होता जा रहा था। दूर कोपनहेगन शहर का तट अब रौशनी की एक धुँधली पंक्तिबद्ध रेखा जैसा नज़र आने लगा था। अँधेरा घिरने लग गया था। हवा में ठंडक बढ़ती जा रही थी। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने उसे हौले से आवाज़ दी, ‘सिल्विया, आओ नीचे रेस्तराँ में चलकर कॉफी पी लो, हवा बहुत ठंडी है।’ मेरी बात सुनकर सिल्विया पलटी, उसकी आँखों में फिर वही गीलापन था। मैंने मज़ाक़ में कहा, “ऐसी ‘चश्मेनम’ मैंने कभी नहीं देखी।” हिन्दी वह समझ सकती थी पर इतना भी नहीं, जवाब में सिर्फ़ मुस्कुराने का अभिनय करते हुए वह मेरे साथ जहाज़ के पाँचवीं मंज़ि‍ल पर बने रेस्तराँ में आ गई।

उससे मैं सिर्फ़ तीन दिन पहले मिला था। भारतीय मूल का होने के कारण हम सहज ही एक-दूसरे की ओर आकर्षित हुए और बातचीत होने लगी। इतने बड़े क्रूज़ पर दो हफ़्ते के रोमांचक सफ़र पर निकले दुनिया भर के अलग-अलग रंग-रूप, वेश-भूषा और भाषा-बोली के हज़ारों लोगों के बीच यह बेहद सामान्य सी बात थी। जहाज़ पर हज़ारों अपरिचितों की भीड़ में हमारी त्वचा का रंग और एक सी भाषा ही हमें जोड़ रही थी। नीचे रेस्तराँ में हमेशा की तरह ख़ूब गहमागहमी थी। ज़्यादातर लोग दिन भर वहाँ बैठे कुछ न कुछ खाते रहते हैं, कई तो रात दिन बार में बैठे पीते ही रहते हैं, जिनमें पता नहीं क्यों महिलाओं की संख्या ज़्यादा है। वे सोने भी जाते होंगे इसमें शक है। पूरे जहाज़ पर बुज़ुर्ग दंपतियों की संख्या ज़्यादा है। हालाँकि तमाम युवक और युवतियाँ भी हैं, लेकिन वे पति-पत्नी के बजाय दोस्त ज़्यादा नज़र आते हैं।

मेरी सिल्विया से अब तक छिटपुट बातें ही हुई थीं। आज मैं उससे विस्तार से बातें करने के मूड में था। कॉफ़ी की सिप लेते हुए मैंने उससे पूछा, ‘‘एक बात बताओ तुम हमेशा जहाज़ की सबसे ऊपरी मंज़ि‍ल की खुली छत पर घंटों क्यों खड़ी रहती हो? वहाँ जागिंग ट्रैक है। सैकड़ों लोग या तो वॉक करते हैं या दौड़ते हुए तुम्हारे बगल से निकल जाते हैं, लेकिन तुम्हें एहसास भी नहीं होता है।” मेरा सवाल सुनकर उसकी आँखें फिर शीशे के पार समंदर के असीम फैलाव पर जाकर ठहर गईं। दूर-दूर तक गहरे नीले रंग का पानी, कोई ओर-छोर नहीं। फिर एक लम्बी साँस भरते हुए उसने कहा, “पता नहीं क्यों जब मैं पानी के जहाज़ पर आती हूँ तो सिनेमा की रील की तरह सभी स्मृतियाँ तैरने लगती हैं। उदासी से ख़ुद को बचा पाना असंभव हो जाता है।

मैं उन्हीं यादों में डूब जाती हूँ। आज मेरे साथ कोई नहीं है। मैं अकेले अपनी जड़ें छोड़कर कनाडा में आकर बस गई हूँ। यह विस्थापन मुझे और भी सालता है, मेरे पूर्वजों ने भी चार पीढ़ियों पहले अपना देश छोड़ा था। सारे सुखों के बावजूद वे आजीवन अपने उसी देश की यादों में खोये रहते थे। वहीं की बातें, वहीं का खाना और वहाँ की ही भाषा पर हमेशा ज़ोर देते रहते थे, हालाँकि वह सिलसिला तीन पीढ़ियों तक अच्छी तरह चला पर नए देश की संस्कृति, भाषा, खान-पान, रहन-सहन ने अपने पंख ऐसे फैलाये कि सब कुछ धीरे-धीरे लुप्त हो गया। चौथी पीढ़ी तक आते-आते मैं बहुत कुछ भूल चुकी हूँ। सिर्फ़ अंग्रेज़ी बोलती हूँ या थोड़ी-बहुत हिंदी और स्थानीय भाषा। अब तो मैं वह देश भी छोड़ आई जहाँ मेरे पूर्वज भारत से हज़ारों मील दूर आकर बस गए थे।

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हालाँकि कनाडा में मुझे कोई परेशानी नहीं है, ज़रूरी पैसा है माँ बाप का दिया हुआ। ख़ुद भी बड़ी डॉक्टर हूँ। अच्छी कमाई हो जाती है लेकिन एकाकीपन खाने को दौड़ता है। अकेलेपन से बड़ी बीमारी कोई नहीं होती। मैं ख़ुद एक बड़ी नामी डॉक्टर होने के बावजूद इस रोग का इलाज नहीं खोज पाई। शायद इसका इलाज सिर्फ़ वक़्त या ऊपर वाले के हाथ में होता है। शाम को जब लौट कर आती हूँ तो घर काटने को दौड़ता है। कितनी देर टीवी देखूँगी या नौकरों से बात करूँगी। इसीलिए साल में कम से कम चार बार क्रूज़ पर आती हूँ, दो-दो हफ़्तों के लिए। यहाँ पूरी दुनिया मिल जाती है। नए लोग मिल जाते हैं, उनसे जान-पहचान हो जाती है, तमाम देशों के लोगों के बारे में जानने को मिलता है। ऐसा लगता है कि एक ‘मिनी दुनिया’ दो हफ़्तों के लिए इस जहाज़ पर आकर बस गई है।” वह एक साँस में बोलती चली गई, जैसे इन पलों में एक अजनबी के सामने वर्षों से मन में भरे गुबार को निकालकर हल्का हो जाना चाहती हो।

उसकी बात सुनकर मैं खामोश हो गया। दुख उसके शब्दों से छनकर मुझ तक पहुँच रहा था। मन और माहौल भारी हो गया इसीलिए न चाहते हुए भी एक सवाल मेरे मुँह से निकल गया, “तब तो सिल्विया, तुम्हारी आँखें कुछ और भी खोजती होंगी।” उसने अपनी लंबी बरौनियाँ उठाकर प्रश्नवाचक निगाहों से मेरी ओर देखा।

“मेरा मतलब है मन में कहीं न कहीं यह आशा भी ज़रूर छिपी होगी कि शायद कभी कोई ऐसा मिले जिससे उस बीमारी का इलाज निकल आए।”

“आप दिमाग़ बहुत तेज़ चलाते हैं” उसका स्वर थोड़ा तीक्ष्ण था। अपनी बात कहने में शायद मैं उपयुक्त भाषा का प्रयोग नहीं कर पाया था। वह नाराज़ होकर एक झटके में कुर्सी से उठकर खड़ी हो गई। मेरे देखते-देखते वह तेज़ी से दरवाज़े की ओर बढ़ी और फिर आँखों से ओझल हो गई। शायद जहाज़ की चौदहवीं मंज़ि‍ल पर अपने आलीशान विला में गई होगी। इस जहाज़ की चौदहवीं और तेरहवीं मंज़ि‍ल पर एक से एक भव्य सुइट हैं। हर एक यूनिट में तीन बड़े कमरे, ड्राइंग रूम, छोटा सा हेल्थ क्लब, बड़ी सी बाल्कनी होती है। बहुत महँगे किराये पर ये सुइट मिलते हैं। वहाँ क्रूज़ की ओर से विशेष सेवा उपलब्ध होती है जिसके तहत हमेशा बटलर तैनात रहता है, लेकिन मैंने कभी सिल्विया को बटलर की सेवा लेते नहीं देखा। वह हमेशा नीचे ग्यारहवीं मंज़ि‍ल पर बने विशाल रेस्तराँ में आकर ही लोगों के बीच नाश्ता, लंच और डिनर करती थी।

उस रेस्तराँ में जब मैं पहली बार सिल्विया से मिला तो वह वेस्टइंडीज़ के अश्वेतों के ग्रुप में बैठी थी, जिसमें अधिकतर अफ्रीकी मूल के अश्वेत और वहाँ रहने वाले साँवले अप्रवासी भारतीय थे। बाक़ी मेज़ों पर भारी संख्या में अमेरिका, इंग्लैंड, यूरोप के गोरे बैठे रहते थे। इस रेस्तराँ की ख़ासियत यह थी कि यहाँ हमेशा बुफ़े लगा रहता था और मुफ़्त में खाने की सुविधा थी, जबकि अन्य रेस्तराओं में भुगतान करना पड़ता था। इसलिए सबसे ज़्यादा भीड़ इस रेस्तराँ में ही रहती थी। एक भारतीय वेटर जो देहरादून का रहने वाला था अक्सर मेरे पास आकर बड़बड़ाता था कि इन बूढ़े गोरों को तो देखो सर। दिन भर खाते ही रहते हैं और फिर रात में दबाकर पीते हैं। पता नहीं कैसे हज़म करते हैं। हमारे यहाँ के बूढ़े लोग तो इस उम्र में इनके मुक़ाबले चिड़िया की तरह चुगते हैं। मैं हँसकर उसकी बात टाल देता था।

जहाज़ पर मैक्सिको और ब्राजील के भी बहुत लोग थे जिनमें से कई एकदम भारतीय जैसे लगते हैं लेकिन पूछने पर पता चलता कि वे कभी भारत आए ही नहीं। उनके लिए भारत दुनिया के दूसरे छोर पर बसा एक देश है। हालाँकि मैं उस वेटर की बात को मज़ाक़ में लेता था लेकिन कहीं न कहीं मुझे लगता है कि भारतीय बुज़ुर्गों को इन गोरे वृद्धों से जीवन जीने की कला सीख लेनी चाहिए। इस उम्र में उनकी जीवंतता एक मिसाल है। ज़्यादातर 75 से 90 साल की उम्र के लोग। सुबह जमकर नाश्ता करना, फिर स्वीमिंग पूल पर जाना, वहाँ बियर पीना और तैरना, दोपहर के खाने के बाद पूल के किनारे पड़ी बेंच पर धूप में सोना, 4 बजे या तो जहाज़ के डेक पर तेज़ वाक करना या जिम में जाकर कम से कम एक घंटे ट्रेड मिल या साइकलिंग, कई तो वेट्स भी करते हैं।

5 से 6 बजे तक हाई-टी पर केक, पेस्ट्री और स्कोर्न क्रीम के साथ खाना, साढ़े सात बजे डिनर टेबिल पर रेड वाइन के साथ रात का डिनर जो नौ बजे तक चलता। इसके बाद उन्हीं वृद्ध महिला-पुरुषों में से अधिकतर रात दस बजे चौथी मंज़ि‍ल के डांस फ्लोर पर आ जाते हैं और 12 बजे रात तक ड्रिंक्स के साथ डांस करते हैं। यही इनकी दिनचर्या है जबकि हमारे भारतीय बुज़ुर्ग इतनी कड़ी दिनचर्या की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। हमारे यहाँ तो लोग 65 साल के बाद बुढ़ापा स्वीकार कर लेते हैं और समझते हैं कि अब जीवन में कुछ बचा ही नहीं है, जैसे-तैसे बस दिन काटते रहते हैं।

जिस ग्रुप में सिल्विया बैठी थी उसकी शक्ल किसी से मेल नहीं खा रही थी। वह एकदम गोरी चिट्टी और ख़ूबसूरत थी। बस उसके लंबे काले बाल ही उसके भारतीय होने का संकेत दे रहे थे। उसकी ख़ूबसूरती से मैंने उसके पंजाबी होने का अंदाज़ा लगाया और हिन्दी में बात शुरू की। उसने बताया कि हिन्दी उसे बस ठीक-ठाक आती है, समझ आती है पर बहुत अच्छी नहीं इसलिए उसने मुझसे अंग्रेज़ी में ही बात करने का आग्रह किया। बातों ही बातों में उसने बताया कि ब्रिटिश राज में उसके दादा के पिता गन्ने के खेतों में मज़दूरी करने के लिए भारत से वेस्टइंडीज़ (त्रिनिदाद) गए थे।

चूँकि पानी के जहाज़ से चार महीने में लोग वहाँ पहुँचते थे इसलिए वापस आने की कोई कल्पना भी नहीं करता था। वे हमेशा के लिए पूरे गाँव से विदा लेकर जाते थे। अपनी माटी को छोड़ना आसान नहीं होता। वही लोग मज़दूर बन कर हज़ारों किलोमीटर दूर जाते थे जो बेइंतहा ग़रीब होते थे और जिनके लिए खाने के भी लाले होते थे। जीवन में जब कोई आशा नहीं बचती थी तो भाग्य को पानी के जहाज़ के भरोसे कर वे अपने वतन को अलविदा कह देते थे।

सिल्विया पूरी रौ में अपने पुरखों की आपबीती कहे जा रही थी। बरबस मेरे मन में कौंधा सिल्विया ने भी तो त्रिनिदाद छोड़ दिया है, जहाँ उसके पूर्वज पिछली तीन पीढ़ियों से रहते आ रहे थे। वह भी तो अब कनाडा में जा बसी थी पर क्यों? न वह बेहद ग़रीब थी और न ही असहाय। फिर यह निर्वासन वह क्यों झेल रही थी? सवाल कई थे लेकिन मैं देख पा रहा था कि मुझसे बात करते हुए उसके दिल का बोझ उतर रहा है। मैं यह लय तोड़ना नहीं चाहता था, उसे दोबारा छेड़ना मुझे ठीक नहीं लगा। सिल्विया जैसे ख़ुद से मुख़ातिब थी। पिता और दादा की स्मृतियाँ जैसे साकार हो उसके सामने आ खड़ी हुई थीं। शब्दों में दोहराते हुए वह उन स्मृतियों को जैसे वर्तमान में जी रही थी। उसकी यादों से गुज़रता हुआ जैसे मैं भी उस समय में जा खड़ा हुआ था। किसी चलचित्र की भाँति सारी घटनाएँ सजीव हो मेरी आँखों के सामने फ़्रेम दर फ़्रेम घटित हो रही थीं।