पहले Fear, फिर Dear… ऐसी होती है हॉस्टल लाइफ

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कैसे बीता पहला दिन?

मैं असीम अग्रवाल अमरोहा उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूं. आज से 12 साल पहले टीनेज में मम्मी-पापा मुझे हिंदू कॉलेज के हॉस्टल के एक डबल सीटर रूम में छोड़ गए थे. पेरेंट्स के जाते ही सालों स्कूल लाइफ में ढला मेरे भीतर का एक 17 साल का बच्चा सहम सा गया था. मन में तमाम सवाल आ रहे थे कि यहां कैसे अकेले रहूंगा. मम्मी नहीं होंगी तो नाश्ता कैसे करूंगा. पापा की आवाज के बिना जागूंगा कैसे, कपड़े कौन धोएगा, पढ़ने के लिए टोकाटोकी कौन करेगा, अकेले घबराया तो साथ कौन देगा…

यह सोचते-सोचते पहला पूरा दिन बीत गया. ये साल 2010 का वक्त था जब देश में कॉमनवेल्थ गेम्स आयोजित होने थे. इस दौरान हॉस्टल की मरम्मत करके उसे मेहमानों के लिए तैयार किया गया था, हालांकि हॉस्टल्स में कोई रुका नहीं था. फिर भी हमें हॉस्टल मिलने में देर हो गई थी. तीन महीने मुझे बाहर रहना पड़ा. मन में हॉस्टल मिलने की आस भी थी. ये पता था कि मेरिट से हॉस्टल मिलेगा, फिर मिलने पर मन में खुशी भी थी.

खैर, पहली शाम बीतते-बीतते मुझे हॉस्टल के बारे में सुनी बातें भी याद आ रही थीं. उनमें सबसे ज्यादा टेंशन दे रही थी रैगिंग को लेकर सुनी कहानियां. अब वो वक्त भी आ गया था जब हमें सीनियर के सामने पेश होना था. हम नया बैच थे तो हॉस्टल की पुरानी परंपरा के अनुसार हम सब सीनियर के सामने पेश हुए. अब चूंकि वो हिंदू कॉलेज था तो यहां पहला इंट्रोडक्शन आपको विशुद्ध हिंदी में देना था. मैं हिंदी का छात्र था तो मुझे बहुत दिक्कत नहीं हुई. वहीं, कई बच्चे जो अलग-अलग विषय में एडमिैशन लिए थे, उन्हें हिंदी में अपना सब्जेक्ट बताना भी भारी लग रहा था.

स्टेटिक्स विषय के एक छात्र से जब पूछा गया तो वो सांख्यिकी शब्द सही से बोल नहीं पा रहा था. उसकी काफी हंसी उड़ी लेकिन सब मजे भी ले रहे थे. इस दिन के बाद ही हमें हॉस्टल के रूल पता चल गए. हमें सीनियर्स के साथ रूल फॉलो करते हुए अच्छा रिश्ता बनाए रखने की सीख मिल चुकी थी. आखिरी में हर किसी से जन गण मन सुना जाता था जोकि कहीं अटकना नहीं चाहिए. इस रैगिंग ने मेरे मन में छुपे डर और संकोच को काफी कम कर दिया था.

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5 रूल थे जरूरी, पहला- सीनियर्स आर ऑलवेज राइट

जी हां, (हंसते हुए) यह हॉस्टल का पहला रूल था जिसे हमने गांठ बांध लिया था. यहां हमारे लिए पांच रूल थे जो हमें हर हाल में फॉलो करने थे. वैसे इसे रूल नहीं बल्किा परंपरा कहा जाता था कि सीनियर्स आर ऑलवेज राइट, जूनियर्स आर ऑलवेज रांग….फिर दूसरा नियम था कि आपको कहीं भी कोई सीनियर दिखे तो आपको गुड मॉर्निंग, गुड इवनिंग या नमस्ते आदि में उनका अभिवादन करना है.

तीसरा नियम था प्रतिद्वंद्वी कॉलेज को लेकर. उस कॉलेज के बारे में ऐसी बात प्रचलित थी कि अंग्रेजों के जमाने में उस कॉलेज की बिल्डिंग में लिखा गया था कि डॉग्स एंड इंडियंस आर नॉट एलाउड, तो तीसरा नियम देशभक्तिन की परंपरा का था कि डॉग्स आर अलाउड बट….आर नॉट अलाउड. फिर चौथा नियम भी उसी कॉलेज को लेकर था कि उस कॉलेज का कोई स्टूडेंट मिले तो हमें कहना है कि योर कॉलेज वाज ए स्कूल, इज ए स्कूल एंड विल बी ए स्कूल…हा हा हा, बस बात इतनी थी कि उस कॉलेज में प्रेयर होना, टाइमिंग होना आदि जैसे नियम थे. आखिरी नियम था हिंदू सलाम, ये नियम कॉलेज को सलाम करने का था. जिसे हम समय-समय पर नारे के तौर पर दोहराते रहते थे.

खानपान की आदतें और हम…

जो बात मैं आगे बता रहा हूं, उसे अब हॉस्टल की खासियत कहूंगा लेकिन उस दौर को याद करता हूं तो ये मेरे लिए बड़ा मुश्किआल लग रहा था. एक शुद्ध शाकाहारी के लिए कैंटीन में एक साथ खाना बड़ा अनुभव था. मेरे साथ साउथ इंडियन, हरियाणा बिहार, नॉर्थ ईस्ट से लेकर अफगानी छात्र तक पढ़ते थे. खाने को लेकर सबकी विविधता थी. कैंटीन में सबके साथ बैठकर खाना पहले कठिन लगता था, लेकिन धीरे-धीरे मुझे ये स्वीकार करना आ गया था. हम घुलने-मिलने लगे तो किसी के खानपान से भी परहेज खत्म हो चुका था.

वो खूनी झील का सफर कभी नहीं भूलेगा

हॉस्टल की सबसे खूबसूरत यादों में आज मेरे पास ‘खूनी झील का सफर’ है. लेकिन उस वक्त ये क्या था, मैं शब्दों में बयान भी नहीं कर सकता. ऐसा था कि हॉस्टल में ये बात फेमस थी कि कॉलेज के पास जंगल में एक रिज है जहां एक खूनी झील है. सीनियर आपको किसी भी दिन उस खूनी झील के दर्शन को ले जा सकते हैं. एक दिन ऐसा भी आया जब मेरा वहां जाने का नंबर था. उड़ते-उड़ते खबर मुझ तक पहुंची तो मैंने दरवाजा भीतर से बंद कर लिया. लेकिन सीनियर हमसे कहीं ज्यादा तेज थे. उन्हें बाहर से हाथ डालकर दरवाजा खोलना बखूबी आता था. उन्होंने दरवाजा खोला और मुझे रात 12 बजे अपने साथ उस सफर पर ले गए जिसे खूनी झील का सफर कहा जाता था. वहां जाने में मैं जितना डर रहा था. आज सोचकर भी हंसी आती है. सब बहुत आसानी से बीत गया था.

हॉस्टल में आप भूखे नहीं सो सकते

हॉस्टल लाइफ का शुरुआती दौर काफी खास था. चुनाव के दौरान का वक्त हो या फेस्ट की तैयारियों का…सीनियर की मदद में हम जुटे थे. कॉलेजों और वॉल ऑफ डेमोक्रेसी में पोस्टर लगाना, कॉलेज के इलेक्शन में तैयारियों में जुटने के बाद कई बार रात के 12 बज जाते थे, लेकिन उस वक्त सीनियर बहुत दरियादिली से पेश आते थे. रात को भरपेट गर्मागर्म पराठों के सामने ठंडी लेई से पोस्टर लगाने का दर्द एकदम गायब हो जाता था. सीनियर्स का एक फंडा था या यूं कहें कि उनका रूल था ये कि हॉस्टल में आप भूखे नहीं सो सकते.

रूम नंबर 16 का टोटका..

हमारे हॉस्टल टाइम में रूम नंबर 16 काफी चर्चा में रहता था. इसकी खास वजह थी कि उस रूम से ही कोई न कोई कॉलेज के प्राइम मिनिस्टर पद पर चुना जाता था. फिर वहां पर ये बात फैल गई कि रूम नंबर 16 का टोटका अपनाओ और चुनाव जीतो.

हॉरर फिल्में, हॉन्टेड रूम… वो रातें

इसी तरह हॉस्टल में हॉन्टेड रूम होने की अफवाह भी खूब जोरों पर रहती थी. ऐसा कहा जाता था कि फलां रूम ने फलां ने सुसाइड किया, वहां उसकी आत्मा रहती है. इस पर रात में डरावनी फिल्में देखने का शौक भी चरम पर था. हाल ये था कि डर भी है लेकिन डरावनी फिल्म भी देखनी है. हम सब लाइट बंद करके 13बी, शापित और 1920 जैसी फिल्में देखते थे, उसके बाद रात में टॉयलेट तक जाने में डरते थे.

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अपना घर?

शुरुआत में जहां अपने घर जाने का चार्म बहुत रहता था. फिर पढ़ाई और हॉस्टल लाइफ एकदम अपनी लगने लगी थी. जब घर जाते थे तो अपना रूम जहां सोने जगने पढ़ने और खाने का अपना टाइमिंग था, अपने दोस्त थे, वो सब बहुत याद आते थे. फिर हॉस्टल में लौटकर आते तो अपना रूम ही लगता था जैसे अपना घर है.

आदिम दुख झेलना भी यहीं सीखा

टीनेजर लाइफ में जब यहां हम आते हैं तो अपनी जिम्मेदारी खुद उठाना सीखकर नहीं आते. यहां आकर हर काम आपको खुद ही करना है. कोई आपको पढ़ने के लिए नहीं कहेगा. आपको खुद ही पढ़ना है, आपको खुद ही वक्त पर खाना है, खुद साफ रहना है तो कपड़े धोने हैं. इस खुद की कड़ी में होता है दुख…जिसका बोझ भी खुद ही उठाना होता है. मैंने भी पांच साल में हॉस्टल में दो आत्महत्याएं देखीं. ये मेरे लिए आदिम दुख था. अभी बताते हुए भी मेरी आंखें भर आईं कि कैसे म्यूजिक डिपार्टमेंट के भैया जो साथ उठते-बैठते थे, कितना डिप्रेशन में जाने लगे थे. ऐसे ही एक और हमारे सीनियर थे जिनसे मिलकर ये तो लगता था कि परेशान हैं, लेकिन इतना परेशान हैं कि आत्महत्या कर लेंगे, कभी सोचा भी नहीं था. इनकी आत्महत्या ने जैसे हमको दुख के सागर में धकेल दिया था. जिस उम्र में हम यहां आते हैं, उस उम्र में कई हार्मोनल बदलाव हो रहे होते हैं, साथ ही परफार्मेंस प्रेशर भी होता है. ये प्रेशर घर से या कॉलेज से कहां से स्टूडेंट ले लेते हैं, ये तो मैं नहीं कह सकता. फिर भी सही मेंटल हेल्थ काउंसिलिंग न मिल पाने से कई लोगों को डिप्रेशन में जाते भी देखा.

वी-ट्री की पूजा और हॉस्टल का रोल

हिंदू कॉलेज में लंबे समय से वैलेंटाइन डे पर वी-ट्री की पूजा का चलन है. इस मौके पर सभी छात्र कैंपस के एक पेड़ की पूजा करते हैं, इसे खूब सजाया जाता है और बॉलीवुड की किसी हिरोइन को दमदमी माई का खिताब देकर उसकी सांकेतिक पूजा की जाती है. इसमें जो मेन पुजारी बनता है, वो हमारे हॉस्टल का उस साल का मिस्टर फ्रेशर होता है. हॉस्टल में मिस्टर फ्रेशर बनने का ये अपने आप में अलग क्रेज था. खैर अब मैं हिंदी में पीएचडी कर रहा हूं और ग्वायर हॉस्टल में रह रहा हूं, यहां का अपना अलग अनुभव है.

कैंपस और ड्रेस सेंस

डीयू में 70 फीसदी के करीब लोग सामान्य परिवारों से आते हैं. ये देशभर के अलग-अलग क्षेत्रों से आते हैं, यहां आकर आपका कैंपस के हिसाब से फैशन सेंस भी डेवलप होता है. मैं अपना उदाहरण दूं तो मैं कई फूल पत्तिोयों वाली शर्टें लेकर आया था, फिर यहां आकर पता चला कि अरे ये तो गोवा बीच वाली शर्ट हैं. प्लेन यहां ज्यादा इन हैं, इस तरह कई बार फैशन बदला, क्लासें बदलीं, लोग बदले, कई साथी बिछड़े तो खूब लिपटकर रोए, लेकिन नहीं बदला तो हॉस्टल लाइफ को और ज्यादा जी लेने का जज्बा.

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ऐसी जिंदगी जहां कोई जजमेंटल नहीं है

मैं तेनजिंग नीमा अरुणाचल प्रदेश के एक छोटे से शहर की रहने वाली हूं. मेरे पिता आर्मी में थे, जो अब रिटायर हैं. मम्मी हाउसवाइफ हैं. मैं अपने मम्मी-पापा की अकेली बच्ची हूं जो बचपन से केयरिंग रवैये से पली. लेकिन बड़े होते ही पापा का रवैया एकदम अलग था. वो कहते थे कि तुम अकेली हो तो क्या, अपनी लाइफ में इंडिपेंडेंट बनना सीखो. ये दुनिया उसी की है जो अकेले सर्वाइव करना जानता है. खैर, मैंने 12वीं तक की स्कूलिंग के बाद जब दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिले का मन बनाया तब मेरे मन में यहां की लाइफ को लेकर बहुत डर था.

साल 2020 में मैं आई. ये कोरोना का टाइम था तो शुरुआत में कोई दिक्कत नहीं हुई. लेकिन उसके एक साल बाद जब यहां आई तो मेरे लिए ये एकदम अलग जगह थी. अब मैं डीयू के एक बेहतरीन कॉलेज के बेस्ट हॉस्टल में थी. यहां मेरे लिए हर कोई अपरिचित था. दूसरा मेरा एक्सेंट भी औरों से अलग था. यहां आकर मैंने बहुत कुछ बदला. जैसे मैं हमेशा से लांग टीशर्ट, जींस आदि कपड़े पहनने वाली लड़की थी जो कभी खुलकर जीने की हिम्मत ही नहीं करती थी. स्कूल से निकलने के बाद लॉकडाउन में और भी ज्यादा इंट्रोवर्ट हो गई. यहां आकर भी मैं वैसी ही थी. हॉस्टल के पहले दिन मुझे बहुत अलग सा लग रहा था. यहां सब अलग-अलग कल्चर से आए थे. खैर रूम मेट के साथ पहले थोड़ी बहुत बातचीत शुरू हुई, वो काफी फ्रेंडली थी.

 

 

हॉस्टल नहीं आती तो…

फिर क्लासेज शुरू हुईं और एक बार मैं तबीयत खराब होने के कारण दो दिन क्लास में नहीं जा पाई. तब पहली बार मुझे पता चला कि भले ही मैं अपनी भाषा और दूसरे प्रदेश से आने के कारण किसी से बात नहीं करती, लेकिन ये सभी मुझे जानते हैं. जब मैं क्लास पहुंची तो बहुत सी लड़कियों ने मुझसे पूछा कि अरे तुम दो दिन क्यों नहीं आईं. फिर धीरे धीरे मेरी दोस्ती हरियाणा, असम, साउथ इंडिया, यूपी, उत्तराखंड आदि की लड़कियों से होने लगी. अब वो दिन बताती हूं जब पहली बार मुझे अपनी दोस्त की बर्थडे पर तैयार होना था. मेरी दोस्त ने कहा कि तुम ऐसे कपड़े क्यों पहनती हो, तुम्हारी फिगर तो वेस्टर्न के लिए एकदम फिट है. उसी के साथ मैंने कमला नगर से शॉपिंग की और वेस्टर्न मॉडर्न कपड़े खरीदे.

मुझे यहां ये देखकर बहुत ही अच्छा लग रहा था कि मेरे कपड़ों से लेकर मेरी टूटी-फूटी हिंदी पर कोई जज नहीं कर रहा था. ये सबके लिए बहुत सामान्य बात थी. तब से मैं ऐसे ही कपड़े पहनने लगी. कपड़ों को लेकर मेरी झिझक खत्म हो गई थी. हॉस्टल लाइफ की दूसरी सबसे खूबसूरत चीज है यहां का खानपान. हम अरुणाचल के लोगों का खानपान एकदम अलग होता है. वहां तड़का दाल, सांभर या इडली का चलन ही नहीं है. यहां दोस्तों के साथ मैंने दूसरे खाने टेस्ट करने शुरू किए. धीरे-धीरे मुझे भी ये खाना पसंद आने लगा.

मेरे लिए ये एक ऐसी लाइफ है जो मुझे खास बनाती है. मुझे अब अपने घर अकेले जाना, अकेले जीना, अपनी सुरक्षा खुद करना, अपने फैसले लेना, अपने लिए शॉपिंग करना सब कुछ इस नई लाइफ ने सिखा दिया. मेरी बोली भाषा, रहन-सहन, मेरे लुक किसी भी चीज के लिए कोई जजमेंटल नहीं है. मैं हॉस्टल नहीं आती तो शायद लाइफ को इतना बिग साइज में नहीं जी पाती.

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… वहां छोड़ा तो दिल रोने लगा

मैं कुणाल कांवत, जयपुर सिटी की टोंक रोड पर मेरा घर है. मेरे पापा सरकारी कॉलेज में प्रोफेसर हैं. अभी मैं डीयू नॉर्थ कैंपस से लॉ में पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहा हूं. मैं ग्वायर हॉस्टल में फिलहाल अकेला हूं जो आईआईटी से बीटेक डिग्री लेकर अब लॉ की पढ़ाई कर रहा हो. जब भी कोई ये बात जानता है तो सबसे पहला सवाल यही होता है कि क्यों भाई, ऐसा क्यों….तुमने आईआईटी से पढ़कर भी नौकरी क्यों नहीं की. जब मैं कहता हूं कि मैंने जॉब के लिए एप्लाई ही नहीं किया था, तो उन्हें बड़ा अजीब लगता है.

हां, अजीब लगना लाजिमी है. आईआईटी बॉम्बे से पढ़कर भी कोई लाखों के पैकेज का जॉब न करे, ये किसी को पचता ही नहीं. लेकिन मैंने कभी इस एंगल से सोचा ही नहीं. मेरे लिए पैसा कमाना सेकेंडरी बात रही. मैं अपनी पसंद का काम करना चाहता हूं. वो काम जरूरी नहीं कि मेरी डिग्री पर आधारित हो. मुझे पढ़ना पसंद है, तो पढ़ रहा हूं. सिर्फ नौकरी के लिए पैसों के लिए पढ़ाई मैंने कभी नहीं की.

मेरे मन में ये परिवर्तन कैसे आया? ये सवाल जब सोचता हूं तो 17 साल का कुणाल याद आता है, जो 12वीं करके आईआईटी के लिए कंपटीशन निकालकर पेरेंट्स के साथ मुंबई पहुंचा था. वहां मुझे आईआईटी बॉम्बे में दाखिला मिला था. उस दिन तेज बारिश हो रही थी. मम्मी-पापा मुझे आईआईटी के हॉस्टल में छोड़ने आए थे. यह हॉस्टल जहां था, वो पेड़-पौधे और जंगल जैसा इलाका था. पापा-मम्मी ने मुझे वहां छोड़ा तो दिल भीतर से रोने लगा. साथ में जो रूम मेट था, उसे भी पहचानता नहीं था. लेकिन आईआईटी के हॉस्टल का अलग ही माहौल होता है.

हम अब हॉस्टल लाइफ में बसने लगे थे…

खाने-पीने से लेकर हर चीज के लिए कोई न कोई यहां गाइड कर रहा था. मेरे मन के भीतर कहीं न कहीं रैगिंग का डर भी था. मैं पहली रात जब सोया तब भी लग रहा था कि कहीं मेरे साथ रैगिंग वगैरह न हो जाए लेकिन एंटी रैगिंग स्क्वॉयड ने ये होने नहीं दिया.

यहां के अगले दिन के माहौल में भी मैं अपने घर को याद कर रहा था. होम सिकनेस के कारण बहुत से मेरे जैसे बच्चे परेशान थे. फिर मेंटर ने काउंसिलिंग की और ऐसे हमारा पढ़ना शुरू हो गया. मेरी ब्रांच सिविल इंजीनियरिंग की थी. मशीनों की पढ़ाई में मन लगने लगा था. अब दिन भर पढ़ने के बाद रात में हॉस्टल में आने पर अपने रूम मेट से बातें करने लगा. हम दोनों के बीच बॉन्डिंलग होने लगी. साथ ही हॉस्टल में मेरे और भी दोस्त बनने लगे थे. अब पढ़ाई के साथ शरारतों और मस्तियों के दौर भी चलने लगे थे. हम अब हॉस्टल लाइफ में बसने लगे थे.

इसी हॉस्टल लाइफ में ही मैंने अपने मन की सुननी शुरू की. मुझे लगने लगा था कि इंजीनियर बनकर जिंदगी बिताना मेरे लिए नहीं है. मैं आईआईटी की पढ़ाई पूरी करके इंजीनियर ही बनने का सपना नहीं देख पाता था. पढ़ाई चल रही थी, लास्ट सेमेस्टर आने तक साथ के स्टूडेंट जॉब के लिए तैयार थे. लेकिन मैंने एप्लाई नहीं किया था. यहां तब तक मेरा एक ग्रुप बन चुका था, वो न सिर्फ सपोर्ट कर रहे थे, बल्कि उन्होंने भी मेरी तरह ही फॉर्म नहीं भरा था.

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दोस्त मुझे पढ़ाकू कुणाल कहने लगे थे

खैर, वो लास्ट डे भी आया जो दुख से डूबा था. अब हॉस्टलर्स फ्रेंड्स से बिछड़ना दुखी कर रहा था. हम एक-दूसरे के साथ अपने नंबर शेयर कर रहे थे. लेकिन कुछ दोस्तों का वहीं से साथ मिल गया और मैं जैसे अपने भीतर और अपने साथ अपना हॉस्टल लेकर दिल्ली आ गया. मैंने वहां सुना था कि यूपीएससी की पढ़ाई सबसे टफ है. हमने तय किया कि हम लोग इस एग्जाम को निकालेंगे. हम करोल बाग इलाके में पीजी में रहने लगे. पहले ही प्रयास में मैंने प्री एग्जाम निकाल दिया था. अब मेंस लिखने की बारी थी. मैंने मेंस परीक्षा भी लिखी, इसमें सेलेक्शन नहीं हुआ.

मेरे दोस्तों ने आगे भी परीक्षा निकाली तो कुछ आगे की तैयारी दोबारा करने लगे. लेकिन यहां भी मुझे लगने लगा कि शायद मेरा मन अभी कुछ दिन और पढ़ने का था. मुझे हॉस्टल में रहकर कुछ दिन और पढ़ना था. उसी दौरान मेरे एक फ्रेंड ने बताया कि वो डीयू से लॉ की पढ़ाई कर रहा है. मेरे मन में अब डीयू से पोस्ट ग्रेजुएशन इन लॉ करने का विचार आया. मैंने यहां की प्रवेश परीक्षा दी तो मेरा सेलेक्शन भी हो गया. नंबर अच्छे थे तो मेरिट में मुझे ग्वायर हॉस्टल मिल गया.

यहां की हॉस्टल लाइफ एकदम अलग थी, कुछ ज्यादा आजाद, नो कर्फ्यू, कभी-कभी प्रोटेस्ट में जाना कभी देर रात लाइब्रेरी जाना. सबसे खास बात यह थी कि यहां हम सब हम उम्र होने के बजाय 23 से 30 साल तक के छात्र थे. फिर भी हम यहां आकर जैसे एक हो गए थे. मेरे क्लोज फ्रेंड मुझे पढ़ाकू कुणाल कहने लगे थे. मुझे यहां रहना एकदम अलग अनुभव लग रहा था. यहां मेरे हरियाणा और राजस्थान के भी कई दोस्त मिल गए थे.

सच कहूं तो हॉस्टल लाइफ मेरे लिए अब घर जैसी है. ऐसा घर जहां सब एक होकर भी एक-दूसरे को हर कदम पर जज नहीं करते. उन्हें ये बात अच्छी लगती है कि मैंने आईआईटी बॉम्बे से पढ़कर भी लाखों के पैकेज का जॉब लेने के बजाय स्टडी को चुना. जब मैं उनसे कहता हूं कि मेरे लिए पैसा कमाना सेकेंड्री बात रही. मैं अपनी पसंद का काम करना चाहता हूं. वो काम जरूरी नहीं कि मेरी डिग्री पर आधारित हो. मुझे पढ़ना पसंद है, तो पढ़ रहा हूं. सिर्फ नौकरी के लिए, पैसों के लिए पढ़ाई मैंने कभी नहीं की. इस पर मुझे यहां सपोर्ट मिलता है.