पांचवां संस्करण : प्रवासियों की आजीविका में सुधार, ‘हमें शीर्ष पर पहुंचने की ताकत चाहिए’

डिप्टी एसोसिएट एडिटर उदित मिश्रा द्वारा संचालित आइई थिंक माइग्रेशन के नवीनतम संस्करण ने प्रवासियों की खराब आजीविका के संरचनात्मक कारणों का पता लगाया और घरेलू तथा गंतव्य दोनों राज्यों में स्थितियों के सुधार के लिए नीतिगत समाधानों पर चर्चा की।

डिप्टी एसोसिएट एडिटर उदित मिश्रा द्वारा संचालित आइई थिंक माइग्रेशन के नवीनतम संस्करण ने प्रवासियों की खराब आजीविका के संरचनात्मक कारणों का पता लगाया और घरेलू तथा गंतव्य दोनों राज्यों में स्थितियों के सुधार के लिए नीतिगत समाधानों पर चर्चा की।

राधिका कपूर
भारतीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (आईसीआरआईईआर) में अध्येता
अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिक अधिनियम, और पिछले साल चार नए श्रम संहिता होने से, इनमें से किसी भी चुनौती का समाधान नहीं होता है।

मनीष सभरवाल
अध्यक्ष, टीमलीज
पिछले साल की प्रवास की भीड़ कई लोगों के लिए आश्चर्य की बात हो सकती है, लेकिन यह एक सहवर्ती बीमारी थी और भारत में यह स्थिति पहले से मौजूद थी।

दीपक मिश्रा
प्रोफेसर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
यह सिर्फ नौकरियों की बात नहीं है। यह शहर के अधिकार, किफायती आवास, स्वास्थ्य अवसंरचना और शिक्षा के बारे में है। ये निर्धारक हैं जो कमजोरियां पैदा करते हैं, इसलिए नीति को इसका समाधान करना होगा।

प्रवासियों की आजीविका के अवसरों पर कोविड का प्रभाव
राजीव खंडेलवाल :
पिछले साल कोविड से एक ऐसा संकट शुरू हुआ जो पहले से मौजूद था। संकट रोजगार का नहीं है (लेकिन) मजदूरी, संकट काम की गुणवत्ता और काम की स्थिति का है। तो हर किसी के पास नौकरी है, लेकिन हर किसी के पास वास्तव में अच्छी नौकरी नहीं है। सबसे पहले, मजदूरी में 20 से 30 फीसद की कमी आई है। काम के दिनों की संख्या कम है।
रोजगार के अवसर क्यों बाधित हो रहे हैं
राधिका कपूर : तथ्य यह है कि हम विनिर्माण और विशेष रूप से श्रम उन्मुखी विनिर्माण के उस चरण से नहीं गुजरे हैं, जिसमें विकास का अर्थ हो कि हमारे शहर उत्पादक रोजगार सृजन के इंजन नहीं बन गए हैं और हमने उस तरह की व्यापक अर्थव्यवस्थाओं को नहीं देखा है जिनकी हमने किसी देश के विकास की सामान्य प्रक्रिया के साक्षी होने की आशा की हो।
नीति क्या कर सकती है
मनीष सभरवाल : सरकारों के पास सिर्फ तीन साधन होते हैं। हमारे पास राजकोषीय नीति है, हमारे पास मौद्रिक नीति है। यदि राजकोषीय घाटा देशों को अमीर बना सकता है, तो कोई भी देश गरीब नहीं होगा।
अगर सेक्टरों की बात करें तो आइटी सेक्टर में भारत की केवल 0.4 फीसद श्रम शक्ति है लेकिन सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान 8 फीसद है; कृषि में 42 फीसद श्रम शक्ति है, लेकिन यह जीडीपी में इसका योगदान 15 फीसद है।
हम प्रवासी श्रमिकों की आजीविका के अवसरों में सुधार कैसे कर सकते हैं?
दीपक मिश्रा : अगर हम इसके बारे में गंभीर हैं, तो हमें तीन पहलुओं पर ध्यान देने की जरूरत है- मूल क्षेत्र, विशेष रूप से मूल क्षेत्रों में अवसर; प्रवासन प्रक्रिया; और, अंत में, गंतव्य पर क्या किया जा सकता है? प्रारंभिक बिंदु मूल क्षेत्रों में संरचनात्मक कमजोरियों को दूर करना है। यह पलायन को कम करने या रोकने के लिए नहीं है।

एक जिम्मेदार व्यवसाय ही सफल है : पुदुमजी

हमने सोचा कि इससे पहले कि हम कहीं और उंगली उठाएं, क्यों न हम कॉरपोरेट के तौर पर कुछ ठोस करें। हमने एनजीओ दसरा के साथ साझेदारी करके एक मामूली शुरूआत की है। हमने मुंबई, पुणे और अहमदाबाद में समान विचारधारा वाले अन्य कॉरपोरेट्स के साथ हाथ मिलाया। हमने भारत में उद्योग में कार्यरत अनौपचारिक श्रमिकों के लिए अधिक गरिमा और समता सुनिश्चित करने के लिए एक पहल की है और इसे सोशल कॉम्पैक्ट या सोको कहा है। एक जिम्मेदार व्यवसाय एक सफल व्यवसाय के बराबर है। हमने पिछले साल सितंबर में छह आउटकम एरिया की पहचान करके इस सोको पहल की शुरूआत की थी, जो उद्योग से जुड़े अनौपचारिक श्रमिकों की संवेदनशीलता को रेखांकित करते हैं, जिसमें सभी के लिए आजीविका, कार्यस्थल और साइटों पर सुरक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा कवर, शिकायत निवारण तंत्र, महिलाओं के काम और मुआवजे में लैंगिक समानता, आधार कार्ड, चिकित्सा बीमा, पीएफ, पीएसआईसी जैसे अधिकारों के साथ सभी के लिंकेज शामिल हैं।

मेहर पुदुमजी
अध्यक्ष, थर्मेक्स लिमिटेड
यह सब चौंकाने वाला था, लेकिन यह हमेशा से मौजूद रहा है। कोविड ही इसे सतह पर ले आया। हमें खुद से पूछना होगा कि हमने अपने शहरों को क्या बन जाने दिया है? अत्यधिक विशेषाधिकार और गरीबी का शहर? यह बहुत अन्यायपूर्ण लगता है।

राजीव खंडेलवाल
संस्थापक, आजीविका ब्यूरो
रोजगार का संकट नहीं है। वेतन, काम की गुणवत्ता और काम के माहौल का संकट है।

शिल्पा कुमार
साझेदार, ओमिड्यार नेटवर्क इंडिया
तथ्य यह है कि आपके पास 50 फीसद आबादी शहरों की 10 फीसद भूमि में रहती है, अनौपचारिक परिस्थितियों में रह रही है और यह न केवल मजदूरी बल्कि जीवन यापन की स्थिति को भी प्रभावित करती है।