बीजेपी नेता ने उठाया कश्मीरी पंडितों का मुद्दा, कहा- मस्जिद क्यों नही हुई बंद, जहां से कहा गया था अपनी बेटी-पत्नी को छोड़ के चले जाओ वरना काट दिए जाओगे

बता दें कि 1990 में लाखों कश्मीरी पंडितों को घाटी में अपना घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था। हालांकि उनके लिए समय-समय पर आवाजें उठती रहती हैं, लेकिन अभी तक उनके पुनर्वास को लेकर कोई ठोस हल अभी तक नही निकल पाया है।

Gaurav Bhatia BJP, BJP भाजपा राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव भाटिया(फोटो सोर्स: फेसबुक)

कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का मुद्दा एक बार फिर से उठाया गया है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव भाटिया ने एक ट्वीट कर लिखा है कि, आखिर उस मस्जिद को बंद क्यों नहीं किया गया जहां से आवाज आई थी कि कश्मीर छोड़ दो नहीं तो काट दिए जाओगे। बता दें कि गौरव भाटिया ने अपने ट्वीट में देश के मुसलमानों को लेकर कहा है कि आखिर तब कहां था देश का मुसलमान, जब मस्जिदों से हिंदुओं को काटने की बात हो रही थी।

उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा कि, “कश्मीरी पंडितों के विस्थापन के संदर्भ में- जब मस्जिद से अजान आई थी कि अपनी बेटी-पत्नी को छोड़ के चले जाओ वरना काट दिए जाओगे, फिर कहाँ था इस देश का मुसलमान? उस मस्जिद को क्यों नही बंद किया जहाँ से ये अजान आई थी?”

गौरव भाटिया के इस ट्वीट पर लोगों ने अपनी प्रतिक्रियाएं भी दी हैं। एक यूजर सैयद अली (@Syedali3323Syed) ने गौरव को अजान और फरमान में अंतर बताते हुए लिखा कि, “आसानी से लोग मनगढ़ंत झूठ बोलते है, पर अजान और फरमान में फ़र्क नही समझते, अजान के मायने समझना चाहिए कि अजान में क्या शब्द बोला जाता है।”

एक और ट्विटर यूजर(@16abha16) ने लिखा कि, “ऐसा दोबारा नहीं हो, इसके लिए आपकी सरकार ने अब तक क्या किया है या कर रही है??” वहीं लता यादव(@LataSwatantra) ने लिखा कि, “लखीमपुर खीरी में हुए नरसंहार की बात कीजिए।”

जब कश्मीरी पंडितों को छोड़ना पड़ा घाटी: गौरतलब है कि लगभग 31 साल पहले 19 जनवरी 1990 में लाखों कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया था। इसको लेकर समय-समय पर आवाजें उठती रहती हैं, लेकिन उनके पुनर्वास को लेकर कोई ठोस रास्ता अभी तक नही निकल पाया है।

पाकिस्तान की तरफ से प्रायोजित आतंकवाद: बता दें कि वर्ष 1989-1990 में जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान की तरफ से प्रायोजित आतंकवाद का असर कश्मीर में ऐसा दिखा कि वहां रह रही हिंदू आबादी का जीवन खतरे में पड़ गया। 1990 के अंत तक घाटी में रह रही 95 प्रतिशत कश्मीरी पंडितों की आबादी अपना घर-बार छोड़कर वहां से चली गई।