ममता बनर्जी कैसे बनेंगी विधायक? चुनाव आयोग ने उपचुनावों पर फिलहाल लगाई रोक

खरदा की, जहां टीएमसी की जीत हुई है लेकिन प्रत्याशी काजल सिन्हा की कोविड के कारण नतीजा आने से पहले मौत हो गई थी। चुनाव आयोग ने इस सीट के लिए चुनाव स्थगन की बात नहीं कही है क्योंकि स्थगन अधिसूचना के बाद ही हो सकता है और इस सीट के लिए अधिसूचना जारी ही नहीं हुई थी।

mamata banarjee

टीएमसी प्रमुख मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद विधानसभा की सदस्य कैसे बनेंगी? पार्टी के आगे यह एक बड़ी समस्या आ गई है। दरअसल, चुनाव आयोग ने कोरोना के उफान का हवाला देते हुए राज्य में दो सीटों पर 16 मई को होने जा रहे उपचुनाव अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिए हैं। ममता तकनीकी कारणों से इन सीटों पर चुनाव नहीं लड़ सकती थीं लेकिन सवाल यह है कि जब कोरोना के कारण ये दो उपचुनाव नहीं हो सकते तो दूसरे उपचुनाव कैसे हो सकेंगे?

बात इस प्रकार है कि जांगीपुर और शमशेरगंज में दो प्रत्याशियों की मौत के बाद चुनाव प्रक्रिया रुक गई थी और नई अधिसूचना में इन सीटों पर 16 मई को मतदान का एलान हुआ था। लेकिन आयोग ने मतदान बेमियादी तौर पर मुल्तवी कर दिया है। ममता यहां से चुनाव लड़ भी नहीं पातीं क्योंकि केवल आरएसपी और कांग्रेस के ही प्रत्याशियों की मौत हुई थी तो केवल इन्हीं दलों के प्रत्याशी पर्चा दाखिल कर पाते।

वैसे सीट तो एक और खाली पड़ी है—-खरदा की, जहां टीएमसी की जीत हुई है लेकिन प्रत्याशी काजल सिन्हा की कोविड के कारण नतीजा आने से पहले मौत हो गई थी। चुनाव आयोग ने इस सीट के लिए चुनाव स्थगन की बात नहीं कही है क्योंकि स्थगन अधिसूचना के बाद ही हो सकता है और इस सीट के लिए अधिसूचना जारी ही नहीं हुई थी। यह सीट चुनाव के लिए ममता को बड़ी मुफीद रहती क्योंकि किसी विधायक को इस्तीफा नहीं देना पड़ता और फिर सीट भी पार्टी की जिती जिताई थी।

मुख्यमंत्री को छह महीने में विधायक बनना होगा लेकिन छह महीने का समय बढ़ाया भी जा सकता है। बशर्ते चुनाव आयोग केंद्र सरकार से विचार-विमर्श के बाद यह प्रमाणित करे कि उक्त समयावधि में चुनाव नहीं कराए जा सकते।

पिछले साल महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को भी बड़ी टेढ़ी स्थिति का सामना करना पड़ा था। विधान परिषद में सीटें रिक्त थीं लेकिन कोरोना के कारण चुनावों पर रोक थी। ऐसे में कैबिनेट ने राज्यपाल कोश्यारी से कहा कि ठाकरे को विधान परिषद में खाली एक सीट पर नामित कर दिया जाए। यह सीट चुनाव वाली न होकर नामांकन वाली थी। लेकिन, राज्यपाल ने कैबिनेट का अनुरोध नहीं माना। तब उद्धव ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा तब कहीं राज्यपाल ने परिषद की रिक्त सीटों के चुनाव के लिए चुनाव आयोग को लिखा। ये चुनाव और इनका प्रचार बहुत छोटा होता है। सो, कोरोना काल में भी हो गए और परिषद के सदस्य बनने से उद्धव की सीट पर से संकट टल गया। लेकिन बंगाल में तो एक ही सदन है। विधान परिषद है ही नहीं!