मराठा आरक्षण मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- सीमा का उल्लंघन असंवैधानिक

संविधान पीठ ने 15 मार्च को मामले की सुनवाई शुरू की थी। सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने भी दलील दी थी कि मराठा समुदाय को आरक्षण देने का फैसला संवैधानिक है।

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मराठा आरक्षण पर महाराष्ट्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट से झठका लगा है। SC ने कहा है कि किसी भी आरक्षण के लिए 50 प्रतिशत की तय सीमा नहीं तोड़ी जा सकती। सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने यह फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि इंदिरा साहनी केस में आया फैसला सही है और इसकी समीक्षा करने की कोई जरूरत नहीं है।

न्यायालय ने आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत पर तय करने के 1992 के मंडल फैसले (इंदिरा साहनी फैसले) को वृहद पीठ के पास भेजने से भी इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति अशोक भूषण की अगुवाई वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ ने सुनवाई के दौरान तैयार तीन बड़े मामलों पर सहमति जताई और कहा कि महाराष्ट्र सरकार ने आरक्षण के लिए तय 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन करने के लिए कोई असाधारण परिस्थिति या मामला पेश नहीं किया।

शीर्ष अदालत ने राज्य को असाधारण परिस्थितियों में आरक्षण के लिए तय 50 प्रतिशत की सीमा तोड़ने की अनुमति देने समेत विभिन्न मामलों पर पुनर्विचार के लिए बृहद पीठ को मंडल फैसला भेजने से सर्वसम्मति से इनकार कर दिया। न्यायालय ने बंबई उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया। उच्च न्यायालय ने राज्य में शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में मराठों के लिए आरक्षण के फैसले को बरकरार रखा था।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने क्या कहा था?
15 मार्च को संविधान पीठ ने इस मामले की सुनवाई शुरू की थी। इससे पहेल बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2019 में कानून को बरकरार रखा था और कहा था कि 16 फीसदी रिजर्वेशन देना उचित नहीं है। रोजगार के लिए आरक्षण 12 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने भी आरक्षण के पक्ष में दलील दी और कहा कि यह रिजर्वेशन पूरी तरह से संवैधानिक है। बता दें कि कर्नाटक, पंजाब. तमिलनाडु, आंध्र समेत और कई राज्यों ने भी आरक्षण के मामले में महाराष्ट्र जैसा ही कदम उठाया था।