मुंबईः Tata Memorial अस्पताल को 61 साल की बुजुर्ग महिला ने दान में दे दी 120 करोड़ की पुश्तैनी प्रॉपर्टी

कैंसर सेंटर के विस्तार के लिए अन्य 18 लोगों ने भी अपनी जमीन को दान दिया है। गौरतलब है कि टाटा मेमोरियल अस्पताल भारत का सबसे बड़ा कैंसर अस्पताल है।

Mumbai, Maharashtra, Tata Memorial Hospital टाटा मेमोरियल अस्पताल को महिला ने दिया 120 करोड़ रुपये की जमीन (एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

एक तरफ जहां लोग किसी भी तरह संपत्ति अर्जित करने में लगे रहते हैं। वहीं मुंबई में एक महिला ने टाटा मेमोरियल अस्पताल से महज 400 मीटर की दूरी पर स्थित 120 करोड़ रुपये की अपनी जमीन अस्पताल को दान कर दिया। दीपिका मुंडले नाम की महिला ने अपनी पुश्तैनी 30 हजार वर्ग फुट जमीन दान में अस्पताल को दिया है।

बताते चलें कि कैंसर सेंटर के विस्तार के लिए अन्य 18 लोगों ने भी अपनी जमीन को दान दिया है। गौरतलब है कि टाटा मेमोरियल अस्पताल भारत का सबसे बड़ा कैंसर अस्पताल है। टाटा मेमोरियल अस्पताल में देश के लगभग एक तिहाई कैंसर रोगियों का इलाज किया जाता है। यहां पर 60 फीसदी मरीजों का मुफ्त इलाज किया जाता है। बताते चलें कि इस अस्पताल का निर्माण साल 1941 में हुआ था। मुंबई के परेल में यह स्थित है।

गौरतलब है कि टाटा ग्रुप भी अपनी सादगी और दरियादिली के लिए जाना जाता रहा है। टाटा ग्रुप के फाउंडर जमशेदजी टाटा अपने निधन के 117 वर्षों के बाद भी दुनिया के सबसे बड़े दानवीर के रूप में जाने जाते हैं। हुरुन रिसर्च एडेलगिव फाउंडेशन की सूची में वह शीर्ष पर हैं। अगर मौजूदा समय के हिसाब से गणना करें तो उन्होंने 7.60 लाख करोड़ रुपये दान किये थे। उनकी दानवीरता की कई कहानियां हैं। व्यापार और कारोबार के साथ जमशेदजी टाटा लोगों की भलाई का काम करते ही रहते थे।

1896 में उन्होंने बॉम्बे के गवर्नर को एक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने कहा कि अब वह पर्याप्त धन कमा चुके हैं और अब लोगों की मदद करना चाहते हैं। उन्होंने लिखा था कि कृषि प्रधान इस देश को अब औद्योगिक आधार की ज़रूरत है। उन्होंने अपनी कमाई का तिहाई हिस्सा दान करके एक इंस्टिट्यूट बनाया जिसे 1909 में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस का नाम दिया गया।

1898 में ब्यूबोनिक प्लेग की वजह से बॉम्बे में बहुत सारे लोगों की जान चली गई। इस बीमारी की स्टडी करने के लिए जमशेदजी टाटा ने बड़ी पूंजी खर्च की। उन्होंने रूस के डॉक्टर की मदद की। ‘पारसी प्रकाश’ पुस्तक के मुताबिक सूरत में बाढ़ प्रभावित इलाकों में वह राहत सामग्री पहुंचवा रहे थे। इसके अलावा 1883 में इटली में आए भूकंप में भी उन्होंने लोगों की बढ़-चढ़कर मदद की।