यहां तक पहुंचने में सालों लगे, इसे भी ख़त्म करोगे क्या? जब मनोज बाजपेयी को मिले चुनाव लड़ने के ऑफ़र! दिया ये जवाब

मनोज बाजपेयी ने बताया कि वो बिहार से हैं तो उन्हें बिहार से ही चुनाव लड़ने के ज्यादा ऑफ़र आते हैं।

manoj bajpayee, manoj bajpayee on politics, manoj bajpayee struggle मनोज बाजपेयी को हाल में फ़िल्म ‘डायल 100’ में देखा गया था (Photo-Social Media/File)

मनोज बाजपेयी की हालिया रिलीज़ फ़िल्म, ‘डायल 100’ को लोगों ने काफ़ी पसंद किया है। Zee 5 की इस फ़िल्म में उन्होंने एक पुलिस की भूमिका निभाई है। इस फ़िल्म के रिलीज़ के दौरान मनोज बाजपेयी ने एक इंटरव्यू दिया जिस दौरान उन्होंने यह बताया कि उन्हें चुनाव लड़ने के ऑफ़र आते रहते हैं। उन्होंने कहा कि वो बिहार से हैं तो उन्हें बिहार से ही चुनाव लड़ने के ज्यादा ऑफ़र आते हैं।

दरअसल, एनडीटीवी के एक इंटरव्यू के दौरान मनोज बाजपेयी से पूछा गया, ‘कहा जाता है कि हर बिहारी के दिल में एक नेता होता है। कई बिहार के अभिनेता राजनीति में सफ़ल भी हुए। आपके मन में अपनी माटी से चुनाव लड़ने की बात आती है?’

 जवाब में मनोज बाजपेयी ने कहा, ‘मैं इसका जवाब भोजपुरी में दूंगा क्योंकि वहीं से मुझे ज्यादा ऑफ़र आते हैं- बड़ा दिन लाग गइल, इंहा तक ले पहुंचे में। अब इहो खतम कराइब का (यहां तक पहुंचने में ही बहुत समय लग गया, अब इसे भी ख़त्म करवाओगेर क्या)?’

उन्होंने हंसते हुए आगे कहा, ‘एक तो इतना संघर्ष करके आदमी यहां तक पहुंचा है। जब हम इंडस्ट्री में आए, या हमने थियेटर शुरू किया, हमारा कोई नहीं था। हम यहां तक पहुंचे हैं, दर्शकों के प्यार और ऊपर वाले के आशीर्वाद के कारण। अब ये सब छोड़कर अब मैं चलूं भटकने के लिए तो ये भी बता सही नहीं है।’

मनोज बाजपेयी ने कहा कि युवाओं को राजनीति में आना चाहिए। उनका कहना है कि वो सामाजिक कामों के लिए हर वक्त तैयार हैं लेकिन राजनीति में वो बिलकुल नहीं आना चाहते।

मनोज बाजपेयी ने कई मौकों पर अपने संघर्ष के दिनों को लेकर खुलकर बात की है। उनके पिता एक किसान थे जिन्होंने अपने सभी 6 बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने की भरपूर कोशिश की। कभी कभी मनोज बाजपेयी भी खेती में अपने पिता का हाथ बंटाते थे। उन्होंने बताया था कि ट्रैक्टर से खेत जोतने का काम भी वो करते थे।

मनोज बाजपेयी ने 12वीं के बाद घर छोड़ दिया और वो दिल्ली आ गए। यहां उन्होंने पढ़ाई के बाद नाटकों में काम करना शुरू किया। मनोज बाजपेयी को एनएसडी में कई बार रिजेक्शन झेलना पड़ा जिसके बाद उन्होंने एक बार आत्महत्या का भी फैसला कर लिया था। उस वक्त उनके दोस्तों ने उनका साथ दिया था। मनोज बाजपेयी को फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ से थोड़ी पहचान हासिल हुई। साल 1998 में आई फ़िल्म ‘सत्या’ ने उन्हें लोकप्रियता दिलाई।