यूपीए के ऑयल बांड पर मोदी सरकार का तर्क, जनता की जेब पर कितना पड़ा फर्क

यूपीए सरकार ने बजट से तेल विपणन कंपनियों को सीधे सब्सिडी देने के बजाय राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए स्‍टेट फ्यूल रिटेलर्स को कुल 1.34 लाख करोड़ रुपए के ऑयल बांड जारी किए थे।

Fuel price, Petrol Diesel Price Today देश के चारों महानगरों में पेट्रोल और डीजल की कीमत में फिर से इजाफा देखने को मिला है। दिल्‍ली में पेट्रोल और डीजल की कीमत में 25 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई है। (PTI Photo)

केंद्र ने तर्क दिया है कि वह पेट्रोल और डीजल पर करों को कम नहीं कर सकता क्योंकि उसे पिछली यूपीए सरकार द्वारा ईंधन की कीमतों में सब्सिडी के लिए जारी किए गए तेल बांड के एवज में भुगतान का बोझ उठाना पड़ता है। फ्यूल प्राइस को कंट्रोल फ्री करने से पहले, यूपीए शासन के दौरान पेट्रोल और डीजल के साथ-साथ रसोई गैस और मिट्टी के तेल को रियायती दरों पर बेचा जाता था। बजट से तेल विपणन कंपनियों को सीधे सब्सिडी देने के बजाय, तत्कालीन सरकार ने राजकोषीय घाटे को नियंत्रित में रखने के लिए स्टेट फ्यूल रिटेलर्स को कुल 1.34 लाख करोड़ रुपए के तेल बांड जारी किए।

इन बांडों पर ब्याज और प्रिंसीपल कंपोपेंट को चुकाने की आवश्यकता का हवाला देते हुए, केंद्र ने अब तर्क दिया है कि उसे अपने फाइनेंस की मदद के लिए हाई एक्‍साइज ड्यूटी की जरुरत है। एनडीए सरकार ने भी 3.1 लाख करोड़ रुपए के रिकैपिटलाइजेशन बांड जारी करके राज्य के स्वामित्व वाले बैंकों और अन्य संस्थानों में पूंजी लगाने के लिए इसी तरह की पॉलिसी का यूज किया, जो 2028 और 2035 के बीच रिडीमप्‍शन के लिए आएगा।

क्या है सरकार का तर्क?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार आज 2012-13 में यूपीए द्वारा की गई तेल की कीमतों में कमी के लिए भुगतान कर रही है। वित्‍त मंत्री ने कहा कि “उनकी चालबाजी को देखो, यह देखते हुए कि पिछली सरकार ने ईंधन पर करों में कटौती की थी, लेकिन वर्तमान सरकार को ऑयल बांड के साथ छोड़ दिया। उन्होंने कहा, ‘हम यूपीए सरकार की तरह हथकंडे नहीं अपनाते। उन्होंने, 1 लाख करोड़ रुपए से अधिक के ऑयल बांड जारी किए। पिछले सात वित्तीय वर्षों से, सरकार सालाना 9,000 करोड़ रुपए से अधिक के ब्याज का भुगतान कर रही है … अगर मुझ पर ऑयल बांड का बोझ नहीं होता, तो मैं फ्यूल पर एक्‍साइज ड्यूटी कम करने की स्थित‍ि में होती।

तेल की कीमतों को कंट्रोल फ्री क्‍यों किया और आम जनता पर क्‍या असर पड़ा
सरकार ने 2002 में एविएशन टर्बाइन फ्यूल, 2010 में पेट्रोल और 2014 में डीजल की कीमतों को मुक्त करने के साथ, फ्यूज को कंट्रोल फ्री करने में फेज वाइज काम कर रहे हैं। इससे पहले, सरकार उस कीमत को तय करने में हस्तक्षेप करेगी जिस पर रिटेलर्स को डीजल या पेट्रोल बेचना था। इससे तेल विपणन कंपनियों के लिए अंडर-रिकवरी हुई, जिसकी भरपाई सरकार को करनी पड़ी। कीमतों को बाजार से जोड़ने के लिए, कीमतों को सब्सिडी देने से सरकार को मुक्त करने के लिए, और वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आने पर उपभोक्ताओं को कम दरों से लाभ उठाने की अनुमति देने के लिए नियंत्रित किया गया था।

जबकि तेल मूल्य नियंत्रण को ग्‍लोबल क्रूड ऑयल की कीमतों से जोड़ा जाना था, लेकिन भारतीय उपभोक्ताओं को ग्‍लोबल क्रूड ऑयल की कीमत में गिरावट से कोई फायदा नहीं हुआ। क्योंकि केंद्र और राज्य सरकारें अतिरिक्त राजस्व बढ़ाने के लिए नए कर और लेवी लगाती हैं। यह उपभोक्ता को या तो वह भुगतान करने के लिए मजबूर करता है जो वह पहले से भुगतान कर रहा है, या इससे भी ज्‍यादा। मूल्य विनियंत्रण अनिवार्य रूप से इंडियन ऑयल, एचपीसीएल या बीपीसीएल जैसे फ्यूल रिटेलर्स को अपनी लागत और मुनाफे की गणना के आधार पर कीमतें तय करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। हालांकि, मूल्य विनियंत्रण के इस पॉलिसी से सरकार को ज्‍यादा लाभ हुआ है।

कितना बढ़ा सरकार का राजस्‍व
कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्‍ट्स पर टैक्‍स से केंद्र का राजस्व 2020-21 में 45.6 फीसदी बढ़कर 4.18 लाख करोड़ रुपए हो गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क साल-दर-साल 74 फीसदी से बढ़कर 2020-21 में 3.45 लाख करोड़ रुपए हो गया। पेट्रोलियम उत्पादों पर करों में केंद्र की हिस्सेदारी 2016-17 में 2.73 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 2019-20 में 2.87 लाख करोड़ रुपए हो गई है। दूसरी ओर, कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों पर करों में राज्यों की हिस्सेदारी 2020-21 में 1.6 फीसदी कम होकर 2.17 लाख करोड़ रुपए रह गई, जो 2019-20 में 2.20 लाख करोड़ रुपए थी।

केंद्र और कई राज्यों ने आर्थिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने वाले कोविड-प्रेरित प्रतिबंधों के मद्देनजर राजस्व बढ़ाने के तरीके के रूप में पेट्रोल और डीजल पर शुल्क में उल्लेखनीय वृद्धि की है। दिल्ली में पेट्रोल के खुदरा मूल्य का लगभग 55.4 फीसदी और डीजल की कीमत का 50 फीसदी राज्य और केंद्रीय शुल्कों का है।दिल्ली में पेट्रोल के खुदरा मूल्य का लगभग 32.3 फीसदी और डीजल 35.4 फीसदी केंद्रीय शुल्क अकेले है। केंद्र ने मई 2020 में पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क को 19.98 रुपए प्रति लीटर से बढ़ाकर 32.98 रुपए प्रति लीटर और डीजल पर 15.83 रुपए से बढ़ाकर 31.83 रुपए कर दिया।

पिछले एक साल में ईंधन की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हुई है। साल की शुरुआत से ही देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 21.7 फीसदी की बढ़ोतरी देखी जा चुकी है। दिल्ली में पेट्रोल फिलहाल 101.8 रुपए प्रति लीटर और डीजल 89.87 रुपए प्रति लीटर पर बिक रहा है। 2021-22 में पेट्रोल की कीमत 39 बार बढ़ी और एक बार घटी है, जबकि डीजल की कीमत 36 बार बढ़ी और दो बार घटी है। 2020-21 में पेट्रोल की कीमत 76 बार बढ़ी और 10 बार कम हुई और डीजल की कीमत 73 बार बढ़ी और 24 बार कम हुई।

ऑयल बांड पर कितनी देनी पड़ी सरकार को सर्विस
पिछले सात वर्षों में भुगतान किए गए तेल बांड पर ब्याज कुल 70,195.72 करोड़ रुपये था। 1.34 लाख करोड़ रुपए के ऑयल बांडों में से केवल 3,500 करोड़ रुपए के प्रिंसीपल अमाउंट का भुगतान हुआ है। बाकी 1.3 लाख करोड़ रुपए इस वित्तीय वर्ष और 2025-26 के बीच चुकाना है।

सरकार को चालू वित्त वर्ष में 10,000 करोड़ रुपए, 2023-24 में 31,150 करोड़ रुपए, 2024-25 में 52,860 करोड़ रुपए और 2025-26 में 36,913 करोड़ रुपए चुकाने हैं। लेकिन यह 3.45 लाख करोड़ रुपए के पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क के दसवें हिस्से से भी कम है, जिसमें से अधिकांश केंद्र को प्राप्त होता है।

बैंकों के लिए मौजूदा सरकार की बॉन्ड पॉलिसी क्या है?
अक्टूबर 2017 में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने घोषणा की थी कि रिकैपिटलाइलेशल बांड एकमुश्त उपाय के रूप में जारी किए जाएंगे, ताकि पीएसयू बैंकों में इक्विटी को इंजेक्ट किया जा सके जो कि बैड लोन की वजह से परेशान हैं। यह साधन राजकोषीय घाटे को प्रभावित नहीं करता है। शुरुआत में, सरकार ने संकेत दिया था कि कुल 1.35 लाख करोड़ रुपए के रिकैप बांड जारी किए जाएंगे, लेकिन बाद में यह नियमित और एक सुविधाजनक अभ्यास बन गया।

सरकार ने अब तक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और एक्जिम बैंक, आईडीबीआई बैंक और आईआईएफसीएल को बजट दस्तावेजों के अनुसार 3.1 लाख करोड़ रुपए के बांड जारी किए हैं। इसमें से 5,050 करोड़ रुपए एक्जिम बैंक को, आईडीबीआई बैंक को 4,557 करोड़ रुपए, आईआईएफसीएल को 5297.60 करोड़ रुपए और आईडीबीआई बैंक को गैर-ब्याज वाले बांड के लिए 3,876 करोड़ रुपए के बांड जारी किए हैं। सरकारी बैंकों को 2.91 लाख करोड़ रुपए की स्‍पेशल सिक्‍योरिटीज जारी की गई हैं जोकि 2028 से मैच्‍योर होनी शुरू हो जाएंगी।