यूपी में पंचायत चुनाव ने दी योगी को चेतावनी? जानें क्या हैं हार-जीत के मायने

शहरी पार्टी के रूप में मशहूर भाजपा ने इससे पहले कभी भी पंचायत चुनावों में सीधे हिस्सा नहीं लिया था और गांवों के चुनावों को भी अवोइड करते रहे है। लेकिन उन्हें झटका लगा है। क्योंकि पार्टी ने खूब तैयारी की थी और प्रत्याशियों की लिस्ट भी जारी की थी।

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यूपी के पंचायत चुनावों में कौन विजेता रहा यह साफ-साफ नहीं कहा जा सकता क्योंकि ये चुनाव पार्टियों के चुनाव चिह्न पर नहीं लड़े जाते। सपा 1000 सीटें जीतने का दावा कर रही है। बसपा 300 सीटों का तो कांग्रेस और आप वाले भी 70-70 सीटों पर जीत का दावा कर रहे हैं।

भाजपा ने 900 से ज्यादा सीटें निकालने का दावा किया है। 900 का अर्थ होता है कि पार्टी समर्थित 2000 से ज्यादा प्रत्याशी हार गए। क्योंकि भाजपा ने 3050 सीटों पर लड़ने का एलान किया था। लेकिन विजेताओं की सबसे बड़ी संख्या निर्दलीयों की है, जिनके सर पर किसी भी पार्टी ने हाथ नहीं रखा था। अब जब ऊंचे पदों के निर्वाचन मसलन जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लाक प्रमुख के निर्वाचन की बात आएगी तो ये निर्दलीय अहम् हो जाएंगे। ये निर्वाचन जनता के जरिए सीधे न होकर अप्रत्य़क्ष होते हैं और इनमें पंचायत सदस्य ही वोट करते हैं।

यूपी के ये चुनाव बहुत बड़ा आयोजन थे। कुल आठ लाख सीटें और प्रत्याशी लगभग 13 लाख। इनमें 3050 जिला पंचायत सीटें, 7500 बीडीसी सीटें और सात लाख सीटें ग्राम पंचायतों की। आइए, समझते हैं। पंचायत राज प्रणाली त्रिस्तरीय होती है। पहले स्तर पर ग्राम पंचायतें होती हैं। यूपी में हर पंचायत में 58 हजार के लगभग मतदाता होते हैं। ये .मतदाता एक प्रधान और पंचायत सदस्य चुनते हैं। इन पदों की कुल संख्या है 7.32 लाख।

पंचायती राज के दूसरे स्तर पर होती हैं क्षेत्र पंचायत। ब्लॉक लेविल के इस निकाय को आम भाषा में बीडीसी कहा जाता है। यूपी में 826 क्षेत्र पंचायतें हैं। हर जिले में औसतन आठ या दस क्षेत्र पंचायतें होती हैं। सदस्य सीधे निर्वाचन से चुने जाते हैं लेकिन ब्लाक प्रमुख का निर्वाचन यही सदस्य करते हैं।

तीसरा स्तर होता है जिला पंचायतों का। उत्तर प्रदेश में 75 जिला पंचायत है। अध्यक्ष से इतर इनके कुल मेंबरों की संख्या 3050 होती है। ये सदस्य सीधे चुने जाते हैं। यही बाद में अध्यक्ष का चुनाव करते हैं।

अब जबकि सदस्यों का चुनाव हो चुका है, अगला चरण ब्लॉक प्रमुखों और जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनाव का होगा जहां हार-जीत का अर्थ पार्टियों को साफ दिखेगा। इन चुनावों में पहले से चुने गए सदस्य वोट करेंगे।

भाजपाः शहरी पार्टी के रूप में मशहूर भाजपा ने इससे पहले कभी भी पंचायत चुनावों में सीधे हिस्सा नहीं लिया था और गांवों के चुनावों को भी अवॉइड करते रहे हैं। लेकिन उन्हें झटका लगा है। क्योंकि पार्टी ने खूब तैयारी की थी और प्रत्याशियों की लिस्ट भी जारी की थी। पार्टी ने जनवरी ने राज्य के छह क्षेत्रों के लिए उच्च स्तरीय कमेटियां बना दी थीं। हर कमेटी में एक मंत्री, एक स्थानीय पदाधिकारी और एक अन्य वरिष्ठ नेता रखा गया था। कमेटी का अध्यक्ष इसी वरिष्ठ भाजपाई को ही बनाया गया था।

चुनाव की तैयारियों की समीक्षा का काम मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद, राधा मोहन सिंह और अरुण सिंह ने किया था। पार्टी ने पदाधिकारियों को भी चुनाव में भाग लेने की दावत देते हुए कहा था कि जीत जाने पर उन्हें पार्टी पद छोड़ना पड़ेगा। कई नेता इसीलिए चुनाव में उतरे भी। यह मानते हुए कि आगामी विधानसभा चुनावों में उन्हें और अच्छे मौके मिल सकते हैं। लेकिन जैसा कि ऊपर बताया गया, नतीजे पार्टी के लिए बहुत मुफीद नहीं गए। अयोध्या और वाराणसी में तो पार्टी की खास किरकिरी हुई है। पार्टी को अब बड़े पदों के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ेगी।

सपाः समाजवादी पार्टी तो अपने को विजेता के रूप में ही पेश कर रही है। लेकिन, जीत के दावों के बाद वह कुल विजेताओं की संख्या कभी नहीं बता पाती। इस पार्टी को भी खुद को साबित करने के लिए जिला पंचायत और ब्लॉक अध्यक्षों के चुनाव बड़ी संख्या में जीतने होंगे। यह जीत विधानसभा चुनाव के लिए उसका मनोबल बढ़ाएगी।