रोम ओलंपिक में हिस्सा लेने वाले भारतीय फुटबॉलर नहीं रहे, भारतीय वायुसेना की भी 5 दशक तक की थी सेवा

1960 के रोम ओलंपिक में भाग लेने भारतीय फुटबॉलर सैयद शाहिद हकीम का रविवार को गुलबर्गा के एक अस्पताल में निधन हो गया है। शाहिद हकीम 82 वर्ष के थे और उन्हें दिल का दौरा पड़ा था, जिसके बाद उन्हें गुलबर्गा के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां आज सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली।

former-indian-footballer-and-olympian-syed-shahid-hakim-passed-away-also-served-in-indian-airforc रोम ओलंपिक में हिस्सा लेने वाले भारतीय फुटबॉलर नहीं रहे, भारतीय वायुसेना की भी 5 दशक तक की थी सेवा (Source: Twitter)

पूर्व भारतीय फुटबॉलर और 1960 के रोम ओलंपिक में भाग लेने वाले सैयद शाहिद हकीम का रविवार को गुलबर्गा के एक अस्पताल में निधन हो गया है। भाषा के मुताबिक परिवार के लोगों से इस बात की जानकारी मिली। उन्हें हकीम साब नाम से भी जाना जाता था। शाहिद हकीम 82 वर्ष के थे और उन्हें दिल का दौरा पड़ा था, जिसके बाद उन्हें गुलबर्गा के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां आज सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली।

हकीम साब का जन्म 1939 में हैदराबाद में हुआ था। उन्होंने भारतीय वायुसेना और भारतीय फुटबॉल दोनों के लिए तकरीबन अपने जीवन के 50 वर्ष दिए। उन्होंने 5 दशक तक भारतीय फुटबॉल की सेवा की। इस दौरान उन्होंने खिलाड़ी, सहायक कोच, मुख्य कोच, रेफरी, मैनेजर कई भूमिकाएं निभाईं। भारतीय वायुसेना में वे स्क्वाड्रन लीडर के पद पर तैनात थे।

आपको बता दें हकीम साब का भारतीय फुटबॉल से 5 दशक तक का नाता रहा है। वह रिटायर होने के बाद कोच बने और उन्हें द्रोणाचार्य पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। वह 1982 एशियन गेम्स में पीके बनर्जी के साथ सहायक कोच थे और बाद में मर्डेका कप के दौरान राष्ट्रीय टीम के मुख्य कोच बने।

घरेलू स्तर पर कोच के रूप में उनका सबसे अच्छा प्रदर्शन महिंद्रा एंड महिंद्रा (अब महिंद्रा यूनाईटेड) की तरफ से रहा, जबकि उनके रहते हुए टीम ने 1988 में ईस्ट बंगाल की मजबूत टीम को हराकर डूरंड कप जीता था।

इसके अलावा शाहिद फीफा के अंतरराष्ट्रीय रेफरी भी रहे और उन्हें प्रतिष्ठित ध्यान चंद पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वायु सेना के पूर्व स्क्वाड्रन लीडर शाहिद भारतीय खेल प्राधिकरण के क्षेत्रीय निदेशक के पद पर भी रह चुके थे।

अगर उनके खेल की बात करें तो शाहिद सेंट्रल मिडफील्डर के रूप में खेला करते थे, लेकिन सच्चाई यह है कि उन्हें 1960 रोम ओलंपिक में खेलने का मौका नहीं मिला था। जबकि उस वक्त कोच उनके पिता सैयद अब्दुल रहीम थे। इसके बाद वह 1962 एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम में भी जगह बनाने से चूक गए थे।