लॉकडाउन में हुआ बेरोजगार तो गांव लौट अपने साथ बदल दी 70 लोगों की किस्मत, अब अपने जैसों को देता है वेतन

रंजन साहू ने महामारी के कारण अपनी नौकरी गंवाने के बाद, केंद्रपाड़ा जिले में अपने गाँव गुंथी में अपनी कपड़े के सिलाई का काम शुरू किया। उन्होंने अपने साथ 70 युवाओं को और जोड़ा, जो अपनी नौकरी खो चुके थे।

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पिछले साल जब देश में लॉकडाउन की घोषणा हुई तो लाखों की संख्या में प्रवासी अपने घरों की तरफ लौट आये। ऐसे ही अन्य प्रवासियों की तरह, 40 वर्षीय रंजन साहू भी वापस अपने घर केंद्रपाड़ा आ गए । इसे पहले रंजन साहू सात सालों से कोलकाता के एक कपड़ा उद्योग में काम करते थे । जो लॉकडाउन होने से बंद हो गयी, जिसके बाद उस कंपनी के सभी कर्मचारी बेरोजगार हो गए ।

रंजन साहू ने महामारी के कारण अपनी नौकरी गंवाने के बाद, केंद्रपाड़ा जिले में अपने गाँव गुंथी में अपनी कपड़े के सिलाई का काम शुरू किया। उन्होंने अपने साथ 70 युवाओं को और जोड़ा, जो अपनी नौकरी खो बैठे है। साहू बताते है कि घर लौटने के बाद उनके  पास रोजगार का जरिया नहीं था। मेरे पास अपने परिवार को चलने के लिए कुछ बचत थी परन्तु कुछ लोगों के पास बचत भी नहीं थी, वो सब लगातार किसी काम की तलाश में थे। मेरे गाँव में बहुत से लोग केरल और सूरत से लौटे थे, जिन्होंने कपड़ा उद्योग में काम किया था। उसके बाद मैंने पीछे पलटकर नहीं देखा और इन लोगों के साथ कपड़ा उद्योग शुरू कर दिया ।

भुवनेश्वर से लगभग 110 किलोमीटर दूर, केंद्रपाड़ा जिले के पट्टामुंडई ब्लॉक के गुंथी में, साहू ने कपड़ा उद्योग शुरू किया जिसका नाम रखा रॉयल ग्रीन गारमेंट कंपनी । 45 सिलाई मशीनों के साथ 3,000 वर्ग फुट में फैले इस उद्योग में 70 प्रवासियों को रोजगार मिला है जो नौकरियों की कमी के कारण अपने गांवों में लौट आए थे।

साहू ने 18 वर्ष के बाद ओडिशा छोड़ दिया था जिसके बाद वो दिल्ली, बैंगलोर, कोलकाता, सूरत और यहाँ तक कि नेपाल जैसे शहरों में लगभग 22 वर्षों तक वस्त्र उद्योग में काम किया। वे बताते है कि मैंने लगभग सभी वस्त्र उद्योगों में प्रबंधन का काम देखा था। परन्तु अपने उद्योग के बारे में कभी नहीं सोचा था। अभी हम अपने इस वस्त्र उद्योग को और विस्तार देने की योजना बना रहे है।

उद्योग में कई महिलाएं भी काम करती है। इस वस्त्र उद्योग में काम करने वाली 22 साल की सागरिका पांडा बताती है की केरल के एर्नाकुलम में एक कपड़ा निर्माण इकाई में काम करती थीं। लेकिन घर लौटने के बाद, मेरे लिए रोजी-रोटी का का जुगाड़ करना कठिन था। मुझे खुशी है कि हमें गाँव के करीब एक अवसर मिला। एक अन्य महिला दीना लेनका कहती है कि लॉकडाउन के बाद कोलकाता से लौट आई थीं। एक महीने बाद हमें गुंथी में इस उद्योग  के बारे में पता चला तो मैंने यहाँ आकर काम करना शुरू कर दिया। हमारे गाँव के ज़्यदातर लोग काम के लिए दूसरे शहरों में ही जाते हैं। वस्त्र उद्योग में नौकरी का अवसर हमारे लिए एक वरदान जैसा है।