हुए तुम दोस्त जिस के…

‘ये फित्ना आदमी की खाना-वीरानी को क्या कम है हुए तुम दोस्त जिस के दुश्मन उस का आसमां क्यूं हो’ मिर्जा गालिब का यह शेर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर पर सही बैठता है जो अपने आस-पास के कण-कण को दुश्मन बनाने में यकीन रखते हैं।

आंदोलनकारी किसानों पर कार्रवाई करती पुलिस। फाइल फोटो।

मुकेश भारद्वाज

‘ये फित्ना आदमी की खाना-वीरानी को क्या कम है हुए तुम दोस्त जिस के दुश्मन उस का आसमां क्यूं हो’

मिर्जा गालिब का यह शेर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर पर सही बैठता है जो अपने आस-पास के कण-कण को दुश्मन बनाने में यकीन रखते हैं। कभी हरियाणा की बड़ी कौम जाट तो अब किसान। खट्टर प्रशासन का इतिहास अपने खिलाफ उठने वाले हर आंदोलन को बेरहमी से कुचलने के लिए भी कुख्यात हो चुका है। खट्टर साहब के दुश्मन बनाने की फितरत से अब भाजपा और सहयोगी दल भी परेशान हो चुके हैं।

मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक साफ-साफ कहते हैं, ‘मुझे राज्यपाल के पद से मोहब्बत नहीं है। मैं जो बोलता हूं दिल से बोलता हूं। मुझे वापस किसानों के बीच जाना है। मैं एक किसान का बेटा हूं उनका मर्म जानता हूं। छह सौ किसानों की मौत हुई। लेकिन सरकार की तरफ से सांत्वना के एक शब्द भी नहीं बोले गए हैं’।

करनाल में किसान प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज के बाद सत्यपाल मलिक ने हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से कहा कि वे किसानों से माफी मांगें। मलिक का बयान यह बताने के लिए काफी है कि किसान आंदोलन कितनी मजबूत जमीन पर खड़ा है। किसानों पर जुल्म कर-कर के खट्टर सरकार अपनी साख इतनी खराब कर चुकी है कि अब भाजपा के लोगों और सहयोगी दलों को ही उनके खिलाफ बोलना पड़ रहा है। अभी तो किसानों का सिर फूटा हुआ दिख रहा है, लहू उनके शरीर से निकल रहा है। लेकिन हरियाणा से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं को अहसास होने लगा है कि यह जख्म उनकी साख पर भी बन रहा है जो बहुत दिनों तक रिसता रहेगा।

नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का आंदोलन शुरू होते ही हरियाणा की केंद्रीय भूमिका साफ-साफ दिखने लगी थी। पंजाब और राष्ट्रीय राजधानी से सटे इस राज्य के अगुआ अगर शुरू से संवाद की स्थिति बहाल करते तो शायद यह आंदोलन आज इतने उग्र रूप में नहीं होता। आंदोलन शुरू होने के साथ ही खट्टर हरियाणा-पंजाब के किसानों को दुश्मन की तरह देखने लगे और उनकी साख पर हमला शुरू कर दिया। चूंकि यह किसी राजनीतिक दल का खड़ा किया गया कोई आसमानी मुद्दा नहीं था तो जमीन पर पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के किसान एकजुट होने लगे। इस एकता का बड़ा असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दिखा।

इससे पहले हरियाणा में जाट आंदोलन को लेकर भी सड़क पर सरकार के खिलाफ संघर्ष की अभूतपूर्व स्थिति पैदा हो गई। मनोहर लाल खट्टर ने सोचा था कि किसान आंदोलन पर भी उसी तरह काबू पा लेंगे। लेकिन यह जाति से वृहत्तर जमीन यानी जीवनयापन का मुद्दा था। आज नौ महीने बाद किसानों के हौसले को तोड़ना आसान नहीं है। अब भाजपा के उन लोगों का हौसला जरूर टूट रहा है जो अपने इलाके की किसी राजनीतिक गतिविधि में हिस्सा नहीं ले पा रहे हैं। खट्टर सरकार के डंडे खाए किसानों के तिरस्कार को झेलना मुश्किल होता जा रहा है।

किसान आंदोलन में भी खट्टर सरकार पुराना नुस्खा अपना रही कि आंदोलन प्रभावित क्षेत्र में प्रवेश कर जाट आंदोलनकारियों की तरह उकसाया जाए। उसके बाद हंगामा होने पर आंदोलकारियों को जातिवादी ठहरा कर आंदोलन को हाशिये पर किया जाए। करनाल की घटना उसी का परिणाम है। एक और चीज बहुत साफ दिख रही है कि बलि का बकरा उन एसडीएम को बनाया जा रहा है जिन पर किसानों के सिर फोड़ने का आदेश देने का आरोप है। सत्यपाल मलिक ने भी कहा कि एसडीएम जो बोल रहे हैं खुद से नहीं बोल रहे हैं। इसकी पुष्टि जिलाधिकारी ने भी की है, लाठीचार्ज उस नाके पर नहीं हुआ जहां एसडीएम आयुष सिन्हा ने मातहतों को आदेश दिए थे।

इसका सीधा मतलब यही है कि अधिकारियों को ऊपर से आदेश मिले थे कि किसान आंदोलन खास जगह से आगे नहीं बढ़ना चाहिए और भाजपा कार्यसमिति का कार्यक्रम निर्विरोध पूरा हो सके। खट्टर भी लोकतंत्र की खातिर लाठीतंत्र के समर्थन में बयान दे ही चुके हैं। एक तरफ यह स्थिति है कि भाजपा के नेता और कार्यकर्ता हरियाणा से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में घुसने की स्थिति में नहीं हैं। पंजाब में तो पहले ही जनाधार साफ हो चुका है। ऐसे में किसानों से संवाद करने के बजाए उन्हें उकसाने की रणनीति को देख कर लगता है, खट्टर सरकार ने अभी तक सबक नहीं सीखा है। उन्हें खुशफहमी है कि जाट आंदोलन की तरह किसानों को भी बेसाख कर देंगे।

लेकिन इस बार उनका पाला संयुक्त किसान मोर्चा से पड़ा है जिसमें घटक तो बहुत हैं, समीकरण भी अलग-अलग हैं। लेकिन खेती और किसानी को लेकर ‘सभी करो या मरो’ वाले भाव से जुड़ गए हैं। यह कोई जाति अस्मिता का मुद्दा नहीं है, इसलिए उकसावे की रणनीति का उलटा परिणाम निकल कर यह किसानों के स्वाभिमान का मुद्दा बन गया है, जैसा राकेश टिकैत वाले मामले में हुआ। टिकैत को हाथ लगाते ही पूरा पश्चिमी उत्तर प्रदेश उबल पड़ा था।

सत्यपाल मलिक भी उसी किसानी की जमीन से बोल रहे हैं कि मुझे वहां लौटना है। मुश्किल यह है कि मलिक से लेकर दुष्यंत चौटाला आहत तो बहुत हो रहे हैं। लेकिन भाजपा से जो सत्ता का जुड़ाव है, उसे भी छोड़ने को तैयार नहीं हैं। दुष्यंत चौटाला आज जितने दुखी दिख रहे हैं, वे अपने दुख का हिसाब मांगेंगे तो खट्टर सरकार भरभरा कर गिर जाएगी। ये लोग दोहरे चरित्र के साथ सामने आ रहे हैं जिसे किसान बखूबी समझ रहे हैं।

खट्टर संकेत दे चुके हैं कि मेरी उम्र तो मार्गदर्शक मंडल में जाने की हो गई। वे हरियाणा में पूरी जमीन खराब कर कभी भी चल दे सकते हैं। लेकिन सोचना उन्हें है जिन्हें आगे किसानों की इस पट्टी पर राजनीति करनी है। इस साल छब्बीस जनवरी के बाद किसानों से कोई बातचीत नहीं की गई है। दमन और बदनाम करने की रणनीति नाकाम ही दिख रही है। खट्टर सरकार को अब तक समझ जाना चाहिए कि यह किसान आंदोलन है कोई मजदूर आंदोलन नहीं। इसका एक आधार है जो राजनीतिक संरचना और हस्तक्षेप का निर्माण कर रहा है। बिना आधार के यह आंदोलन इतना लंबा चल ही नहीं सकता था। खट्टर सरकार अब भी संवाद की मेज को दरकिनार करती रहेगी तो शायद वहां का मार्ग ही बदल जाए और भाजपा सिर्फ दर्शक रह जाए।