2007 के फार्मूले को आजमा कर ‘मिशन UP’ फतेह करना चाहती हैं मायावती, खोए हुए जनाधार को वापस पाने की रणनीति

बसपा सुप्रीमो मायावती दोबारा सत्ता पाने के लिए 2007 में हुए विधानसभा चुनाव की तरह ही ब्राह्मण वोट बैंक को अपने पक्ष में करना चाहती हैं। इसके लिए मायावती ने अपने विश्वस्त और उत्तरप्रदेश के प्रमुख ब्राह्मण चेहरे सतीश मिश्रा को जिम्मेदारी सौंपी है।

मायावती साल 2007 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान अपनाए गए सोशल इंजीनियरिंग का इस्तेमाल आने वाले विधानसभा चुनाव में भी करना चाहती हैं ताकि लखनऊ के सत्ता तक पहुंचा जा सके। (एक्सप्रेस फोटो)

उत्तरप्रदेश विधानसभा के चुनाव होने में अब ज्यादा समय नहीं बचा है। यही वजह है कि सभी पार्टियां इसकी तैयारी में जुट गई हैं। 2017 में हुए विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद बहुजन समाज पार्टी राज्य की राजनीति में लगभग हाशिये पर जा चुकी है। अब एक बार फिर से बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने खोए हुए जनाधार को पाने के लिए 2007 वाला फार्मूला अपनाना शुरू कर दिया है। मायावती इसी फार्मूले के जरिए अपने खोए हुए राजनीतिक ताकत को वापस लाने की कोशिश में जुटी है।

बसपा सुप्रीमो मायावती दोबारा सत्ता पाने के लिए 2007 में हुए विधानसभा चुनाव की तरह ही ब्राह्मण वोट बैंक को अपने पक्ष में करना चाहती हैं। इसके लिए मायावती ने अपने विश्वस्त और उत्तरप्रदेश के प्रमुख ब्राह्मण चेहरे सतीश मिश्रा को जिम्मेदारी सौंपी है। सतीश चंद्र मिश्रा भी मायावती के कहने पर उत्तरप्रदेश के कई जिलों में ब्राह्मण सम्मेलन कर ब्राह्मण वोट बैंक को साधने में जुटे हुए हैं। माना जा रहा है कि मिश्रा राज्य के सभी 75 जिलों में यह कार्यक्रम करने की योजना बना रहे हैं।

ब्राह्मण सम्मेलन की तरह मायावती ओबीसी वोट बैंक को भी साधने में जुटी हुई हैं। इसके लिए बसपा के प्रदेश अध्यक्ष भीम राजभर को लगाया गया है। ब्राह्मण सम्मेलन की तरह ही बसपा ओबीसी सम्मेलन भी शुरू कर चुकी है। दरअसल यूपी में ओबीसी मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं इसलिए मायावती अतिपिछड़ी जातियों को अपने पक्ष में करने में कोई असर नहीं छोड़ना चाहती हैं।

माना जाता है कि एससी और एसटी वोट बैंक काफी समय से मायावती के साथ रहा है। ओबीसी वोट बैंक का कुछ हिस्सा भी मायावती को वोट करता रहा है। चूंकि राज्य में 16 प्रतिशत ब्राह्मण हैं जो किसी भी पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने का दम रखते हैं, इसलिए मायावती ब्राह्मण वोट बैंक को साधकर अपने पक्ष में करना चाहती हैं ताकि लखनऊ तक पहुंचने का रास्ता सुगम हो सके।

मायावती 2007 में भी इस तरह के सोशल इंजीनियरिंग का इस्तेमाल कर चुकी हैं। तब बसपा ने सोची समझी रणनीति के तहत उम्मीदवारों की घोषणा चुनाव से लगभग एक साल पहले ही कर दी थी। तब पार्टी ने करीब 86 ब्राह्मणों को टिकट दिया था। जिसका फायदा मायावती को मिला और बसपा ने 2007 के विधानसभा चुनावों में 30 फीसदी वोट पाकर 206 सीटें जीती थीं। इसमें 41 ब्राह्मण उम्मीदवार भी शामिल थे। मायावती ने 15 ब्राह्मण विधायकों को अपने मंत्रिमंडल में शामिल करके मंत्री भी बनाया था।