OBC मतों में लगातार बढ़ा है बीजेपी का वोट शेयर, फिर भी जातिगत जनगणना से क्यों बचती रही है भाजपा?

2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान बीजेपी ने ओबीसी मतदाताओं के बीच बड़े पैमाने पर पैठ बनाई, जिससे क्षेत्रीय दलों के मूल समर्थन में सेंध लग गई, जिनका वोट शेयर घटकर 26.4 फीसदी ही रह गया।

BJP, RJD, SP, Caste Census देश में एक बार फिर से जातिगत जनगणना की मांग तेज हो गयी है (एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

देश में जातिगत जनगणना की मांग एक बार फिर से तेज हो गयी है। मंडल आयोग के रिपोर्ट को लागू हुए तीन दशक बाद बीजेपी को ओबीसी मतों का एक बड़ा हिस्सा मिलता रहा है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी की जीत में अन्य पिछड़ी जातियों के मतों का अहम योगदान रहा है। दलित, आदिवासी और अपने पारंपरिक मतों की बदौलत बीजेपी सत्ता में पहुंची, लेकिन जातिगत जनगणना के सवाल पर सरकार बचती रही है।

2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान बीजेपी ने ओबीसी मतदाताओं के बीच बड़े पैमाने पर पैठ बनाई, जिससे क्षेत्रीय दलों के मूल समर्थन में सेंध लग गई, जिनका वोट शेयर घटकर 26.4 फीसदी ही रह गया। लोकनीति-सीएसडी द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार भाजपा ने पिछले एक दशक के दौरान ओबीसी मतदाताओं के बीच बड़े पैमाने पर पैठ बनाई है। 2009 के लोकसभा चुनावों में, 22% ओबीसी ने भाजपा को वोट दिया था, जबकि 42% ने क्षेत्रीय दलों को वोट दिया था। लेकिन एक दशक के भीतर, ओबीसी के बीच भाजपा का जनाधार नाटकीय रूप से बदल गया है। 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान, 44% ओबीसी ने भाजपा को वोट दिया, जबकि केवल 27% ने क्षेत्रीय दलों को वोट दिया।

लेकिन मतों के ट्रेंड में सबसे अहम बात जो देखी गयी है वो ये है कि भाजपा मुख्य रूप से लोकसभा चुनाव के दौरान ओबीसी मतदाताओं के बीच लोकप्रिय रही है, लेकिन जब राज्य सरकार चुनने की बात आती है तो वही ओबीसी मतदाताओं के बीच ऐसा नहीं रहता है। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान बिहार में केवल 11% ओबीसी ने राजद को वोट दिया, लेकिन 2020 के विधानसभा चुनाव के दौरान 29% ओबीसी ने राजद को वोट दिया। यूपी में 2019 में केवल 14% ओबीसी ने समाजवादी पार्टी को वोट दिया, लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान 29% ओबीसी ने उसे वोट दिया था। हम लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच कई अन्य राज्यों में ओबीसी के बीच मतदान विकल्पों में ऐसा ही फर्क देख सकते हैं।

साथ ही, उत्तर भारत के कई राज्यों में प्रभावशाली ओबीसी जातियों की तुलना में भाजपा ने निचले ओबीसी वोटों को अधिक सफलतापूर्वक जुटाया है। 2019 के लोकसभा चुनाव में ओबीसी श्रेणी में ऊपरी पायदान पर आने वाली जातियों से 41 फीसदी ने बीजेपी को वोट दिया, जबकि निचले ओबीसी में आने वाले 47 फीसदी ने बीजेपी को वोट दिया। वहीं क्षेत्रीय दल अन्य पिछड़ी जातियों में आने वाले ऊपरी पायदान की जातियों में अधिक लोकप्रिय रही है। उत्तर प्रदेश और बिहार में यादव जैसी जातियों के बीच राजद और सपा की पकड़ अधिक मजबूत रही है।

जाति जनगणना के बारे में भाजपा के अनिच्छुक होने का कारण यह हो सकता है कि विभिन्न जातियों, विशेष रूप से ओबीसी जातियों के बारे में जो संख्याएं सामने आ सकती हैं, वे क्षेत्रीय दलों को ओबीसी को फिर से आकार देने के लिए सत्ताधारी दल पर दबाव बनाने के लिए एक नया मुद्दा दे सकती हैं। केंद्र सरकार की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में कोटा की फिर से मांग उठ सकती है। इसका परिणाम मंडल पार्ट 2 की स्थिति की तरह हो सकता है, जो कई क्षेत्रीय दलों को एक नया मुद्दा दे सकता है, जिससे पिछले एक दशक से भारतीय चुनावी राजनीति पर हावी रही भाजपा को गंभीर चुनौती मिल सकती है।