PM-CARES राजकीय निधि, दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- सरकार को इसे निजी कोष बताने का अधिकार नहीं

उन्होंने कहा कि “हम यह नहीं कह रहे हैं कि इसकी गतिविधियां खराब हैं, बल्कि हम केवल यह कहना चाह रहे हैं कि यह संविधान के अनुशासन के अधीन होना चाहिए। सही बात यह है कि यह राजकीय के अलावा और कुछ नहीं है।”

याचिकाकर्ता ने कहा कि इसे निजी मानने का कोई औचित्य नहीं है। (Express File Photo)

दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि PM-CARES फंड को संविधान द्वारा आवश्यक पारदर्शिता के सिद्धांत का पालन करना चाहिए और इसे राजकीय निधि घोषित किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता सम्यक गंगवाल का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा कि उच्च स्तर के सरकारी अधिकारियों ने ऐसा बताया था कि केंद्र धर्मार्थ ट्रस्ट की स्थापना कर रहा है। याचिकाकर्ता केंद्र के इस रुख का विरोध कर रहा है कि PM-CARES एक सरकारी फंड नहीं है और इसकी राशि भारत के समेकित कोष में नहीं जाती है।

उन्होंने मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की खंडपीठ से कहा, “आप यह नहीं कह सकते कि ‘देखो, हम तय करते हैं कि संविधान हम पर लागू नहीं होता है, हम राज्य नहीं हैं और हम कहीं और चले जाते हैं।”

अदालत ने बुधवार को उस याचिका पर दलीलें सुननी शुरू की जो चाहती है कि संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत पीएम केयर्स फंड को ‘राजकीय’ घोषित किया जाए। गंगवाल ने तर्क दिया कि देश के नागरिक इस बात से परेशान हैं कि प्रधान मंत्री द्वारा स्थापित एक कोष जिसके न्यासी प्रधानमंत्री, गृह, रक्षा और वित्त मंत्री हैं, उस पर कोई सरकारी नियंत्रण नहीं है।

दीवान ने तर्क दिया: “यह सरकारी मशीनरी के समानांतर काम कर रहा है। इस पर शासन का गहरा और व्यापक नियंत्रण है। जिस तरह से वित्तीय सहायता और इसके बारे में सब कुछ…संचालित किया जा रहा है, इससे यह नहीं समझ में आ रहा है कि पीएम केयर्स में ऐसा क्या है जो निजी है? क्या कोई कह सकता है कि यह राजकीय नहीं है। उस स्व-प्रमाणन के अलावा, हम ऐसा कोई कारक नहीं खोज पा रहे हैं कि यह राज्य नहीं है।”

यह भी तर्क दिया गया कि अधिकारियों ने PM CARES को राज्य के रूप में पेश किया तथा राज्य के प्रतीक और .gov.in पोर्टल के उपयोग से यह आधिकारिक मंजूरी देता है। दीवान ने तर्क दिया “प्रतीक आधिकारिक स्वीकृति देता है, जनता का विश्वास, एक संदेश देता है कि यह आपकी सरकार से संबंधित है और संविधान के अनुशासन और भारत के कानूनों के संदर्भ में सब कुछ उसके अधीन होगा। यह निजी मामला नहीं है, जिसे कोई देख नहीं सकता है, जहां सभी दान अपारदर्शी हैं, और जिसका किसी के सामने खुलासा नहीं किया जा सकता है।”

दीवान ने यह भी तर्क दिया कि संविधान को “सूर्य के प्रकाश की तरह पारदर्शिता चाहिए।” PM CARES की संरचना स्वयं में काफी “दोषपूर्ण और त्रुटिपूर्ण” है।“ उन्होंने कहा कि “हम यह नहीं कह रहे हैं कि इसकी गतिविधियां खराब हैं, बल्कि हम केवल यह कहना चाह रहे हैं कि यह संविधान के अनुशासन के अधीन होना चाहिए। सही बात यह है कि यह राजकीय के अलावा और कुछ नहीं है।”

अदालत को बताया गया कि PIB के माध्यम से PMO ने एक प्रेस नोट जारी कर PM CARES फंड में चंदा देने की अपील की थी। यह धारणा बनाई थी कि यह भारत सरकार के अलावा और कुछ नहीं है। अदालत को बताया गया कि उपराष्ट्रपति के साथ-साथ एक कैबिनेट मंत्री और कैबिनेट सचिव ने क्रमशः राज्यसभा के सदस्यों और सरकारी कर्मचारियों से इसी तरह की अपील की और इसे भारत सरकार के धर्मार्थ कोष के रूप में बताया।