SC ने लगा रखी थी रोक, पर BJP शासित उत्तराखंड में चुनाव के पहले प्रोजेक्ट्स को अनुमति पर सहमत हुआ केंद्रीय मंत्रालय

सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक के आठ साल बाद केंद्रीय पर्यावरण, बिजली और जल शक्ति मंत्रालय राज्य में गंगा और उसकी सहायक नदियों पर जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण की अनुमति पर सहमत हो गया है। पर्यावरण मंत्रालय द्वारा 17 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में रखे गए एक समेकित हलफनामे में सहमति व्यक्त की गई थी। सूची में एनटीपीसी की 4×130 मेगावाट की तपोवन विष्णुगढ़ परियोजना है, जो इस साल फरवरी में चमोली जिले में धौली गंगा नदी में अचानक आई बाढ़ से तबाह हो गई थी।

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उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने विधानसभा चुनाव से पहले कई सालों से अटकी पड़ी पनबिजली परियोजनाओं को मंजूरी देने का फैसला किया है। जून 2013 में अचानक आई बाढ़ में 5,000 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड में पनबिजली परियोजनाओं को मंजूरी देने पर रोक लगा दी थी।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक के आठ साल बाद केंद्रीय पर्यावरण, बिजली और जल शक्ति मंत्रालय राज्य में गंगा और उसकी सहायक नदियों पर जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण की अनुमति पर सहमत हो गया है। पर्यावरण मंत्रालय द्वारा 17 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में रखे गए एक हलफनामे में सहमति व्यक्त की गई थी। सूची में एनटीपीसी की 4×130 मेगावाट की तपोवन विष्णुगढ़ परियोजना है, जो इस साल फरवरी में चमोली जिले में धौली गंगा नदी में अचानक आई बाढ़ से तबाह हो गई थी।

इसके अलावा इसमें 1000 मेगावाट टिहरी चरण 2, 444 मेगावाट विष्णुगढ़ पीपलकोट, 99 मेगावाट सिंगोली भटवाड़ी, 76 मेगावाट फाटा ब्योंग, 15 मेगावाट मदमहेश्वर और 4.5 मेगावाट कालीगंगा- 2 प्रोजेक्ट्स शामिल हैं।

टाइमलाइन –
2009: उत्तराखंड ने ‘पहाड़ का पानी, पहाड़ की जवानी’ की थीम पर अपने विजन 2020 स्टेटमेंट का मसौदा तैयार किया।
2012: भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) की एक रिपोर्ट ने अलकनंदा और भागीरथी घाटियों की सुरक्षा के लिए 24 प्रस्तावित बांधों का विरोध किया। अन्य रिपोर्ट में आईआईटी-रुड़की ने कहा कि उपायों की एक स्ट्रिंग प्रभाव को कम कर सकती है।
2013: केदारनाथ आपदा और इसके प्रभाव के बारे में स्वत: संज्ञान लेते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने जलविद्युत परियोजनाओं की मंजूरी रोक दी।
2014: अप्रैल में, पर्यावरणविद् रवि चोपड़ा के नेतृत्व में ईबी ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जो डब्ल्यूआईआई की सिफारिश से सहमत थी।
2015: फरवरी में, आईआईटी-कानपुर के विनोद तारे के तहत एक चार सदस्यीय समिति ने स्वीकार किया कि छह परियोजनाओं को आवश्यक मंजूरी मिली थी, लेकिन चेतावनी दी कि प्रस्तावित बांध क्षेत्र की पारिस्थितिकी पर गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं। हालाँकि, पर्यावरण मंत्रालय ने अदालत के सामने केवल यह तथ्य पेश किया कि छह परियोजनाओं में मजूरी मिल गई है।

2017: नवंबर में, उत्तराखंड ने अपने सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए जलविद्युत की महत्वपूर्णता को रेखांकित किया।
2018: जनवरी में बिजली मंत्रालय ने उत्तराखंड के रुख का समर्थन किया।
2019: जनवरी में, जल शक्ति मंत्रालय ने सात परियोजनाएं (जो पहले से ही पर्याप्त प्रगति और बड़े पैमाने पर निवेश कर चुकी हैं) को इस चेतावनी के साथ वापस लेने पर सहमति व्यक्त की कि उत्तराखंड में गंगा बेसिन में और अधिक जलविद्युत परियोजनाओं की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
2020: मार्च में दास कमेटी ने फाइनल रिपोर्ट दाखिल की। अगस्त में, उत्तराखंड ने “पनबिजली विकास को फिर से शुरू करने” की मांग की।
2021: फरवरी में चमोली में अचानक आई बाढ़ से दो जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित हुईं। अगस्त में, सरकार ने फरवरी में क्षतिग्रस्त एक सहित सात परियोजनाओं का समर्थन किया।